यूं तो अभी लोकसभा चुनावों में करीब दस महीने बचे हैं और उसके पहले मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव भी इसी साल अक्तूबर, नवंबर में होने हैं, लेकिन देश का सियासी तापमान इस कदर चढ़ता जा रहा है मानों लोकसभा चुनाव दो तीन महीने में ही होने वाला हो। अगले साल अप्रैल मई में संभावित लोकसभा चुनावों के महाभारत के लिए राजनीतिक कुरूक्षेत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष की व्यूह रचना तेज हो गई है और दोनों ही खेमे अपने अपने पक्ष के सहयोगियों तक पहुंचने और उन्हें मनाने में जुट गए हैं।
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बंगलूरू में कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह में विपक्षी दिग्गजों के जमावड़े से लेकर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के 'संपर्क फॉर समर्थन' अभियान के तहत देश के चुनींदा लोगों से सीधी मुलाकात, राहुल गांधी की मंदसौर में किसान रैली और दो साल के अंतराल के बाद कांग्रेस द्वारा इफ्तार दावत का आयोजन और बीच में पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के मुख्यालय की यात्रा के अलग अलग सियासी मायने निकालने की कवायद ने मीडिया के समाचार कक्षों को चुनावी वॉर रूम में तब्दील कर दिया है।
वैसे तो 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद से ही जितने भी विधानसभा चुनाव हुए उनमें नरेंद्र मोदी के करिश्मे नें और अमित शाह की रणनीति ने ज्यादातर में भाजपा का झंडा बुलंद किया। लोकसभा चुनावों के बाद हुए हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड और जम्मू कश्मीर में भाजपा को आशा से ज्यादा सफलता मिली। पहली बार हरियाणा जहां भाजपा कभी ओम प्रकाश चौटाला की जूनियर पार्टनर होती थी, वहां पूर्ण बहुमत से सरकार बनी। झारखंड में भाजपा और उसके सहयोगी दल आजसू के गठबंधन को बहुमत मिला।
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महाराष्ट्र में शिवसेना से अलग होने के बावजूद भाजपा 120 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर आई और बाद में शिवसेना को उसे समर्थन देने को मजबूर होना पड़ा। जबकि जम्मू कश्मीर में भाजपा 26 सीटें जीतकर पीडीपी के बाद दूसरे नंबर की पार्टी बनी और पीडीपी के साथ गठबंधन की सरकार बनाई। लेकिन भाजपा के इस विजय रथ को फरवरी 2015 में महज दो साल पुरानी आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में पंक्चर कर दिया और 2013 में विधानसभा की 33, 2014 में लोकसभा की सभी सात सीटें जीतने वाली भाजपा महज तीन सीटों पर सिमट गई।
मोदी-शाह जोड़ी को अगला बड़ा झटका अक्टूबर 2015 में बिहार विधानसभा चुनावों में लगा जहां तमाम संसाधनों, मंत्रियों सांसदों कार्यकर्ताओं की फौज और नरेंद्र मोदी के तूफानी प्रचार के बावजूद लालू-नीतीश-कांग्रेस महागठबंधन के मुकाबले भाजपा समेत पूरा एनडीए महज 58 सीटों पर सिमट गया। लगातार मिली दोनों पराजयों ने मोदी शाह की जोड़ी के नेतृत्व में भाजपा की अजेयता का मिथक टूट गया।
सियासी मैदान में लगातार दो बार मिली शिकस्त ने विपक्ष को विशेषकर कांग्रेस में गलतफहमी पैदा की कि अब मोदी का मुकाबला अकेले किया जा सकता है। लिहाजा कांग्रेस ने असम में 'एकला चलो' की अपनी पुरानी नीति पर अमल करते हुए 2016 के विधानसभा चुनावों में बिहार जैसा गठबंधन बनाने की सलाहों को दरकिनार कर दिया।
उधर भाजपा को सबक मिला कि सिर्फ मोदी की लोकप्रिय छवि के ही सहारे ही चुनावी वैतरणी नहीं पार की जा सकती। इसलिए बिना वक्त गंवाए भाजपा ने असम में असम गण परिषद, बोडो संगठन और अन्य स्थानीय छोटे दलों से गठबंधन कर लिया। नतीजा यह हुआ कि असम में कांग्रेस का 15 साल से चला आ रहा शासन ढह गया और पहली बार पूर्वोत्तर के एक बड़े राज्य में भाजपा गठबंधन की सरकार बनी।
यहां से फिर मोदी शाह की भाजपा का विजय रथ बढ़ चला। दिल्ली और बिहार की करारी हार से टूट चुके पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थक वर्ग के मनोबल को फिर ताकत मिली। इसके बाद उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात, त्रिपुरा, नगालैंड और मेघालय में भाजपा और समर्थक दलों की जीत, गोवा में हार के बावजूद सरकार बना लेने, बिहार में नीतीश कुमार को रातोंरात लालू प्रसाद यादव से अलग करवाकर गठबंधन के जरिए सत्ता में प्रवेश और कर्नाटक में बहुमत न मिलने के बावजूद 40 से 104 सीटों पर पहुंचने को अमित शाह की जीतने की चुनावी मशीनरी और नरेंद्र मोदी के करिश्मे की सफलता के तौर पर देखा गया।
लेकिन दूसरी तरफ पहले पंजाब के गुरुदासपुर, फिर मध्य प्रदेश और राजस्थान उसके बाद उत्तर प्रदेश में गोरखपुर, फूलपुर, कैराना और नूरपुर, बिहार के अररिया, जहानाबाद, जोकीहाट के लोकसभा और विधानसभा उप चुनावों में भाजपा के मुकाबले संयुक्त विपक्ष को मिली सफलता ने कांग्रेस समेत पूरे विपक्ष को मोदी शाह के चुनावी चक्रव्यूह के सातवें दरवाजे को तोड़ने का फार्मूला दे दिया। यदि भाजपा के खिलाफ विपक्षी दलों की एकता अगर परवान चढ़ जाए 2019 में नरेंद्र मोदी और भाजपा की सत्ता वापसी को उसी तरह रोका जा सकता है जैसे 1989 में राजीव गांधी और कांग्रेस को रोका गया था।
विपक्षी एकता का पहला सफल प्रदर्शन बंगलूरू में कुमारस्वामी के मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण समारोह में हुआ जब देश के लगभग सभी भाजपा विरोधी दलों के दिग्गज नेता एक साथ एक मंच पर जुटे, जिनमें अपने अपने राज्यों में एक दूसरे के धुर विरोधी माने जाने वाले दलों के नेता भी शामिल थे। मंच पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और शीर्ष नेता सोनिया गांधी के साथ बसपा नेता मायावती समेत सभी नेताओं के बीच जो गर्मजोशी दिखी उसने भाजपा ही नहीं उसके मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ को भी चौकन्ना कर दिया।
आमतौर पर हमेशा चुनावी मोड़ में रहने वाले नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी विपक्ष के इस अमोघ अस्त्र महागठबंधन की काट में जुट गई। उधर विपक्षी एकता की संभावना और उपचुनावों में भाजपा की विफलता ने सत्तारूढ़ एनडीए के तारों को भी झनझना दिया। आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य के दर्जे की मांग को लेकर तेलुगू देशम पहले ही केंद्र सरकार और एनडीए से अलग हो चुकी है। उसके नेता और आंध्र के मुख्यमंत्री एन.चंद्रबाबू नायडू भाजपा विरोध में इतना आगे निकल चुके हैं कि कर्नाटक में भाजपा की येदियुरप्पा सरकार के गिरने के बाद भाजपा के खिलाफ बने जद(एस) कांग्रेस गठबंधन की सरकार के मुख्यमंत्री के शपथ समारोह में सारे विपक्षी दलों के नेताओं के साथ बंगलूरू में मंच पर पहुंच गए।
जबकि शिवसेना और भाजपा के रिश्ते इस कदर बिगड़ चुके हैं कि केंद्र और महाराष्ट्र की सरकारों में साझेदारी के बावजूद शिवसेना 2019 में अकेले और भाजपा से अलग चुनाव लड़ने का एलान कर चुकी है। अपने मुखपत्र सामना के जरिए शिवसेना लगातार भाजपा और मोदी सरकार पर निशाना साध रही है। पंजाब में हार के बाद अकाली दल का मौन भी भाजपा को भारी पड़ रहा है। मौका देखकर नीतीश कुमार ने रामविलास पासवान के साथ नजदीकी बढ़ाकर भाजपा पर अपना दबाव बढ़ा दिया। उन्होंने पहले नोटबंदी पर अपने पुराने रुख के उलट पूछना शुरु कर दिया कि इसका फायदा क्या हुआ।
जद(यू) नेताओं ने बिहार में 2009 लोकसभा चुनाव के फार्मूले के आधार पर 2019 में सीट बंटवारे का राग अलापना शुरु कर दिया जिसके तहत जद(यू) 25 और भाजपा 15 सीटों पर चुनाव लड़े। लेकिन 2014 में 22 सीटें जीत चुकी भाजपा और छह सीटें जीतने वाली रामविलास पासवान की लोजपा और दो सीटें जीतने वाली उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी रालोसपा अपना दावा कम करने या छोड़ने को तैयार नहीं है। एनडीए में सामंजस्य बनाए रखने के लिए ही एक तरफ अमित शाह तमाम हमलो के बावजूद शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे से मिलने मातोश्री गए और अकाली दल के नेता प्रकाश सिंह बादल से मिलने चंडीगढ़ पहुंचे। दूसरी तरफ पटना में बिहार के एनडीए नेताओं की भोज राजनीति में भाजपा समेत सभी सहयोगी दल जुटे, लेकिन उपेंद्र कुशवाहा इसमें नहीं पहुंचे।
उधर विपक्ष के खेमे में मायावती ने साफ कर दिया कि उत्तर प्रदेश में महागठबंधन तभी बनेगा जब बसपा को सम्मानजनक सीटें मिलेंगी। बुआ की इस दबाव राजनीति को भतीजे अखिलेश यादव ने सिर माथे लिया और घोषणा कर दी कि भाजपा को हराने के लिए सपा कुछ कम सीटों पर भी चुनाव लड़ने को तैयार है। समस्या यह भी है कि इस महागठबंधन में कांग्रेस कहां और कितनी सीटों पर मानेगी। अजित सिंह के रालोद को कितनी सीटें दी जाएंगी। बसपा उत्तर प्रदेश के बाहर भी कांग्रेस गठबंधन या सीटों का तालमेल करना चाहती है। कांग्रेस भी कमोबेश तैयार है। कर्नाटक में बसपा के एकमात्र विधायक महेश को मंत्री बनाकर इसकी शुरुआत भी हो चुकी है। फिलहाल मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस और बसपा के बीच दोस्ती की खिचड़ी पक रही है। अगर यह प्रयोग सफल रहा तो उत्तर प्रदेश की सियासी खिचड़ी में सपा बसपा के दाल चावल के साथ कांग्रेस का पानी बनना और रालोद का तड़का लगना तय है।
विपक्षी महागठबंधन में पेंच और भी हैं। प.बंगाल में कांग्रेस किसके साथ जाएगी तृणमूल या वाम मोर्चा। उड़ीसा में क्या बीजद को कांग्रेस महागठबंधन में शामिल करेगी। असम में क्या बदरुद्दीन अजमल के साथ कोई समझौता होगा। केरल में कांग्रेस और वाम मोर्चा एक दूसरे के खिलाफ लड़ेंगे ही। आंध्र प्रदेश में कांग्रेस क्या टीडीपी से गठबंधन करेगी और तेलंगाना में टीआरएस और कांग्रेस के क्या रिश्ते होंगे। जबकि कांग्रेस का बिहार में राजद, झारखंड में राजद झामुमो, तमिलनाडु में डीएमके, जम्मू कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस, महाराष्ट्र में एनसीपी के साथ गठबंधन तय है। हालांकि विपक्षी महागठबंधन की तस्वीर इस साल अक्टूबर नवंबर में होने वाले चार राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजों पर भी काफी कुछ निर्भर करेंगे।
इनमें कांग्रेस अगर अच्छा प्रदर्शन करती है और मिजोरम में अपनी सरकार बचाते हुए मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में अगर कम से कम दो राज्य भी भाजपा से छीन लेती है तो उसका दबदबा बढ जाएगा और अगर आशा के अनुरूप उसका प्रदर्शन नहीं रहा तो उसे भाजपा विरोधी महागठबंधन में अन्य दलों का दबाव मानना होगा। इसलिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अब अपना पूरा ध्यान चार राज्यों के विधानसभा चुनावों पर लगा रहे हैं। राजस्थान में कांग्रेस को जीत की सबसे ज्यादा उम्मीद है। मध्य प्रदेश में अगर कांग्रेस के तीनों दिग्गज ईमानदारी से एकजुट होकर चुनाव लड़ें तो भाजपा की राह मुश्किल हो सकती है। जबकि छत्तीसगढ़ में अभी भी भाजपा का पलड़ा भारी माना जा रहा है। कुल मिलकार 2019 के लोकसभा चुनावों के महाभारत का कुरुक्षेत्र चार राज्यों के विधानसभा चुनावों के बाद ही तैयार होगा।