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कुरुक्षेत्र : राजस्थान की रेत पर प्रियंका गांधी की सियासी अग्निपरीक्षा

सार

राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और बगावत पर उतरे उप मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट के बीच सुलह कराने में जुटीं कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने एक बड़ा सियासी जोखिम मोल लिया है। एक तरह से राजनीति और मौसम दोनों की गरमी से तपती राजस्थान की सियासी रेत पर प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश के बाहर राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस में अपनी पहली सियासी अग्निपरीक्षा भी दे रही हैं।
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प्रियंका गांधी (फाइल फोटो) - फोटो : पीटीआई
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विस्तार
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प्रियंका के सामने एक तरफ अपने साथ बहुमत के आंकड़े को पार करके विधायकों को एकजुट रखने में कामयाब अशोक गहलोत से सचिन पायलट की वो शर्तें मनवाने की चुनौती है जो पायलट ने प्रियंका के सामने रखी हैं, तो दूसरी तरफ सचिन से यह गारंटी भी लेनी होगी की भविष्य में वह अपनी महत्वाकांक्षाओं को लगाम देंगे और आगे सरकार के लिए कोई संकट पैदा नहीं करेंगे। 

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अगर प्रियंका गांधी सियासी सर्कस की इस पतली डोर पर सफलता पूर्वक चलने में कामयाब हो गईं तो पूरी पार्टी में उनकी नेतृत्व क्षमता का सिक्का जम जाएगा। प्रियंका के बेहद करीबी सूत्रों के मुताबिक राजस्थान का संकट शुरु होने के ठीक पहले सचिन पायलट ने कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी से बात की लेकिन कोई रास्ता नहीं निकला। वहीं कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पूरा मामला अशोक गहलोत और अपने भरोसेमंद अहमद पटेल पर छोड़ दिया।

नेतृत्व से कोई राहत न मिलने के बाद सचिन ने अपने तेवर सख्त किए और अपने दोस्त ज्योतिरादित्य सिंधिया से संपर्क साधा और भाजपा के साथ खिचड़ी पकानी शुरू कर दी। आनन-फानन में पायलट समर्थक करीब एक दर्जन विधायक जयपुर छोड़कर गुरुग्राम आ गए जहां एक रिसॉर्टनुमा होटल में उन्हें ठहरा दिया गया। मीडिया को खबर कर दी गई। उधर गहलोत ने आक्रामक रुख अपनाते हुए तत्काल पुलिस में सरकार गिराने की साजिश का मामला दर्ज करवा दिया।
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रविवार को पूरा दिन पायलट और सिंधिया की मुलाकात और राजस्थान में मध्यप्रदेश दोहराए जाने की खबरें चलती रहीं। पायलट के इस रुख ने सोनिया, राहुल और प्रियंका को बेहद असहज कर दिया। अहमद पटेल ने बीच में सचिन से बात करने की कोशिश की। राजस्थान के प्रभारी अविनाश पांडे ने कई बार सचिन को फोन किया। लेकिन सचिन नहीं माने। उन्होंने अपने ही दल की सरकार के अल्पमत में होने और 30 विधायकों के अपने साथ होने का बयान भी दे दिया। इससे कांग्रेस नेतृत्व बेहद नाराज हो गया। उधर गहलोत ने सोनिया राहुल और पटेल तीनों को भरोसा दिया कि सरकार हर हाल में बचेगी और विधायक उनके साथ आएंगे।

रविवार रात गहलोत से मिलने करीब 80 कांग्रेस विधायक जयपुर पहुंच गए जिनमें कुछ वो विधायक भी थे जिनके सचिन के साथ जाने और गुरुग्राम में होने की चर्चा थी। इससे जहां गहलोत का हौसला बढ़ा वहीं सचिन दबाव में आए। उन्होंने देर रात ही यह बयान दिया कि वह भाजपा में नहीं जाएंगे और जरूरत पड़ी तो अलग दल बना सकते हैं। उनके भाजपा में न जाने के बयान को प्रियंका गांधी ने एक संकेत माना और उन्होंने सोनिया व राहुल से बात की। दोनों ने उन्हें सचिन से बात करने को कहा। 

उधर जयपुर में सोमवार को अशोक गहलोत ने करीब 105 विधायक अपने आवास पर जुटा कर बहुमत खो देने की अटकलों पर विराम लगा दिया। इसी बीच प्रियंका ने सचिन से बात की। सचिन ने उनसे अपनी पीड़ा और अपने साथ हो रही अनदेखी का सिलसिलेवार ब्योरा दिया। प्रियंका ने गहलोत से बात की और कांग्रेस प्रवक्ताओं की ओर से सचिन की वापसी के संदेश दिए जाने लगे। 

सचिन का संदेश लेकर प्रियंका ने सांसद राजीव सातवं को जयपुर भेजा। इसके बाद पी चिदंबरम, अहमद पटेल और राहुल गांधी ने भी सचिन से बात करके उन्हें कांग्रेस में बने रहने को कहा। लेकिन इस पूरी सियासी कवायद में यह सवाल उठ रहा है कि क्या कांग्रेस नेतृत्व उन अशोक गहलोत को झुका कर सचिन की मांगें मानेगा जिन्होंने सरकार और पार्टी को संकट से निकाला है।

अगर गहलोत सचिन की सारी मांगें मान लेते हैं तो क्या इसे सियासी ब्लैकमेलिंग के आगे झुकना नहीं माना जाएगा और पार्टी में इसका क्या संदेश जाएगा। लेकिन दूसरी तरफ सिंधिया के भाजपा में जाने और मध्यप्रदेश सरकार गिरने के बाद कांग्रेस राजस्थान और सचिन पायलट दोनों को खोना नहीं चाहती है। इसलिए प्रियंका की कोशिश है कि गहलोत ने अपनी ताकत और समर्थन दिखा दिया है और अब पार्टी के हित में उन्हें थोड़ी उदारता दिखाते हुए सचिन को सत्ता में हिस्सेदारी देनी चाहिए। 

इससे न सिर्फ सरकार की स्थिरता मजबूत होगी बल्कि विरोधियों को भी झटका लगेगा। इसलिए प्रियंका जहां सचिन को पार्टी हित की दुहाई देकर मनाने की कोशिश कर रही हैं वहीं अशोक गहलोत को भी पार्टी हित के नाम पर कुछ नरम होने को कहा जा रहा है। अगर प्रियंका गांधी इस सियासी अग्निपरीक्षा में खरी उतरती हैं तो न केवल राष्ट्रीय स्तर पर उनकी छवि में इजाफा होगा बल्कि कांग्रेस में भी उनकी उत्तर प्रदेश के बाहर भी भूमिका बढ़ जाएगी।

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