कांग्रेस में इन दिनों खासी उथल-पुथल है। सोनिया गांधी पार्टी अध्यक्ष पद का भार छोड़ना चाहती हैं, लेकिन यह जिम्मेदारी किसे मिले इसे लेकर घमासान है। प्रकट रूप से ज्यादातर नेता राहुल गांधी का नाम फिर चला रहे हैं, लेकिन निजी बातचीत में कई कांग्रेसी नेता राहुल को लेकर अपने किंतु-परंतु भी गिनाने लगते हैं। उधर राहुल गांधी अभी भी पार्टी अध्यक्ष पद संभालने को लेकर कोई सकारात्मक संकेत नहीं दे रहे हैं।
उनकी एक ही रट है कि अब अध्यक्ष गांधी परिवार से बाहर का कोई नेता होना चाहिए। वरिष्ठ नेताओं का एक बड़ा समूह चाहता है कि या तो राहुल प्रियंका में से कोई एक जिम्मेदारी संभाले या फिर पार्टी अध्यक्ष का संगठन के प्रतिनिधि विधिवत चुनाव करें। इस बीच नेताओं का एक छोटा समूह प्रियंका गांधी को अध्यक्ष पद देने की बात भी करने लगा है। पिछले लोकसभा चुनाव में लखनऊ से राजनाथ सिंह के खिलाफ कांग्रेस के टिकट पर खम ठोकने वाले कल्कि पीठाधीश्वर आचार्य प्रमोद कृष्णम इसके अगुआ हैं। उनका कहना है कि अगर राहुल गांधी नहीं तैयार हो रहे हैं, तो प्रियंका गांधी को यह जिम्मेदारी संभालनी चाहिए।
इन दिनों उत्तर प्रदेश की ब्राह्मण राजनीति के केंद्र बने प्रमोद कृष्णम ने कांग्रेस की अधिकारिक लाइन से अलग हटकर आरक्षण के जातीय आधार को भी चुनौती दे दी है।कल्कि पीठाधीश्वर के इन दो कदमों से पार्टी में खासी उथल पुथल है।उनके इन दो कदमों से उत्साहित प्रदेश के कांग्रेस कार्यकर्ताओं के एक बड़े हिस्से ने सोशल मीडिया पर यह लिखना शुरु कर दिया है कि मौजूदा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय लल्लू की जगह लड़ाके आचार्य प्रमोद कृष्णम को प्रदेश पार्टी की कमान सौंप कर पार्टी भाजपा के योगी के मुकाबले कांग्रेस के आचार्य को मैदान में उतारे।
इसी बीच कांग्रेस के निलंबित प्रवक्ता संजय झा के इस कथन कि कुछ सांसदों समेत सौ से ज्यादा कांग्रेस नेताओं ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखकर पार्टी में नेतृत्व परिवर्तन और शीर्षस्थ संस्था कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों का चुनाव कराने की मांग की थी, को भले ही कांग्रेस ने अधिकारिक रूप से गलत बता दिया हो, लेकिन इससे भी साफ है कि कांग्रेस के भीतर सबकुछ ठीक नहीं है और मुहावरों की भाषा में यह महज हांडी का एक चावल भर है। अंग्रेजी में इसे टिप ऑफ दि आइसबर्ग भी कहा जाता है।
दरअसल कांग्रेस के भीतर जो घमासान पिछले एक साल से चल रहा है वह इस समय चरम पर है। और वक्त रहते उसे संभालने की जरूरत है। हाल ही में राज्यसभा के सांसदों की एक वीडियो बैठक में भी जिस तरह कांग्रेस अध्यक्ष के सामने नेतृत्व से सवाल किए गए वह भी भीतर ही भीतर पक रहे इस ज्वालामुखी का संकेत है। पार्टी के भीतर खींचतान का एक मात्र मुद्दा है कि सोनिया गांधी के उत्तराधिकारी के रूप में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी बनें या कोई और।
अगर गांधी परिवार के बाहर से कोई बने तो कौन और कैसे उसका चयन हो। सौ कांग्रेस नेताओं द्वारा नेतृत्व बदलाव को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को लिखे जाने वाले कथित पत्र की बात को कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने गलत बताया है। लेकिन कांग्रेस के एक अन्य नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि पत्र तो लिखा गया था, लेकिन वह पत्र सोनिया गांधी तक पहुंचा या नहीं इस बारे में कहना मुश्किल है। इस नेता के मुताबिक पार्टी में इन दिनों सोनिया गांधी के पुराने वफादार नेताओं और राहुल गांधी के नए सिपहसालारों के बीच सत्ता संघर्ष खासा तेज है।
अध्यक्ष पद से राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद से सोनिया गांधी पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष हैं और पार्टी नेता चाहते हैं कि जल्दी से जल्दी संगठन को पूर्णकालिक अध्यक्ष मिले। दस अगस्त को सोनिया का कार्यकाल खत्म हो रहा था, जिसे बढ़ा दिया गया है। लेकिन सोनिया गांधी की उम्र और सेहत अब संगठन के कामकाज का बोझ बर्दाश्त करने की इजाजत नहीं देती। पिछले दिनों हुई कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में अशोक गहलोत, दिग्विजय सिंह, गुलाम नबी आजाद आदि नेताओं ने राहुल गांधी को फिर अध्यक्ष बनाने की मांग की।
इसके बाद कई प्रदेशों से यह मांग आई और आ रही है। लेकिन राहुल की तरफ से अभी तक कोई सहमति का संकेत नहीं है। अंदर की बात यह है कि पार्टी के ज्यादातर पुराने नेता राहुल गांधी को अध्यक्ष बनाने के पक्ष में नहीं हैं लेकिन खुलकर विरोध भी नहीं कर सकते हैं। इन पुराने सोनिया वफादारों में कुछ तो राहुल की जगह प्रियंका को लाने की बात भी दबी जबान से करते हैं। दस जनपथ के नजदीक माने जाने वाले एक कांग्रेस नेता के मुताबिक सोनिया गांधी की इच्छा राहुल गांधी को फिर से अध्यक्ष बनाने की है लेकिन वह अभी तक उन्हें राजी नहीं कर सकी हैं।
वहीं राहुल के बेहद करीबी एक युवा नेता के मुताबिक राहुल पार्टी के नेता तो बनना चाहते हैं लेकिन वह चाहते हैं कि संगठन की कमान किसी गैर गांधी परिवार के नेता को मिले। इससे जहां राहुल को जनता के बीच जाने का ज्यादा समय मिल सकेगा और वह संगठन के झमेलों से दूर भी रहकर मोदी सरकार के खिलाफ अपने अभियान को तेज कर सकेंगे। इस युवा नेता के मुताबिक राहुल जानते हैं कि एक बार जनता में उनकी स्वीकार्यता बन गई तो पार्टी अपने आप उनके पीछे चलेगी।
इसलिए वह गांधी परिवार से बाहर के अपने किसी वफादार नेता को अध्यक्ष पद पर बिठाना चाहते हैं। इसके लिए उनकी पहली पसंद मौजूदा महासचिव (संगठन) के.सी.वेणुगोपाल हैं। लेकिन कांग्रेस के सभी दिग्गज नेता इसके खिलाफ हैं। वहीं सोनिया चाहती हैं कि अगर राहुल नहीं बनते हैं तो बुजुर्ग सुशील कुमार शिंदे को अध्यक्ष बनाकर यह विवाद भी खत्म कर दिया जाए कि कांग्रेस गांधी परिवार के बाहर देख ही नहीं सकती और जब राहुल चाहेंगे शिंदे अपनी उम्र का हवाला देकर उनके लिए कुर्सी खाली कर देंगे।
वहीं सोनिया गांधी के सबसे भरोसेमंद और पार्टी के कोषाध्यक्ष और राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल की पसंद मुकुल वासनिक हैं, जो दलित होने के साथ साथ न सिर्फ पार्टी और परिवार के प्रति वफादार हैं बल्कि उम्र के लिहाज से भी बहुत बुजुर्ग नहीं हैं और कांग्रेस संगठन के व्यक्ति हैं। लेकिन कांग्रेस के ज्यादातर बड़े नेता चाहते हैं कि अगर राहुल गांधी या प्रियंका गांधी अध्यक्ष नहीं बनते हैं तो किसी को भी नामित करने की बजाय पार्टी संविधान में लिखित संगठन चुनाव प्रक्रिया के तहत अध्यक्ष का मतदान के द्वारा चुनाव हो।
जैसा कि कई साल पहले एक बार सीताराम केसरी, शरद पवार और राजेश पायलट के बीच और दूसरी बार सोनिया गांधी बनाम जितेंद्र प्रसाद के बीच हो चुका है। लेकिन इसमें पार्टी के सीधे विभाजन का खतरा भी है। क्योंकि चुनाव में अगर एक से ज्यादा लोग खड़े हुए तो जीतने वाले के खिलाफ हारे हुए नेता गोलबंद हो सकते हैं और पार्टी में न सिर्फ नेताओं के इर्द गिर्द ध्रुवीकरण होगा बल्कि चुन कर आए अध्यक्ष के मुकाबले पार्टी पर सोनिया राहुल प्रियंका की पकड़ भी कमजोर हो जाएगी। इसलिए सोनिया गांधी और अहमद पटेल चुनाव की जगह नए अध्यक्ष को मनोनीत करने पर ही जोर दे रहे हैं।
दरअसल लोकसभा चुनावों के बाद राहुल गांधी ने जिस तरह कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया और पार्टी की हार के लिए उन बड़े नेताओं को जिम्मेदार बताया जो सोनिया गांधी के न सिर्फ वफादार हैं, बल्कि राजीव गांधी की मृत्यु के बाद भी उनके साथ चट्टान की तरह खड़े रहे। कांग्रेस के एक पूर्व महासचिव का कहना है कि जिन्हें राहुल गांधी का दाहिना बायां हाथ माना जाता रहा है, वो तमाम युवा
नेता महज पांच साल के सत्ता से वनवास में इस कदर परेशान हो गए कि अपने अपने रास्ते और मंजिल तलाशने लगे।
ज्योतिरादित्य सिंधिया जिन्हें 18 साल के सियासी सफर में पार्टी ने सब दिया मध्य प्रदेश की सरकार गिराकर भाजपा की गोद में बैठे हैं। मिलिंद देवड़ा पार्टी में हैं या नहीं इसे वही जानते हैं। यही हाल जितिन प्रसाद, संजय निरुपम, मीनीक्षी नटराजन का भी है। सचिन पायलट का प्रकरण सबके सामने है। अशोक तंवर हरियाणा में कुछ कर नहीं पाए और एन चुनाव के वक्त पार्टी के खिलाफ हो गए।
इनके अलावा रीता बहुगुणा, संजय सिंह, विजय बहुगुणा, रत्ना सिंह, अल्पेश ठाकुर, अजय कुमार, आदि का है। जबकि राजीव गांधी के निधन के बाद जब नरसिंह राव ने अपने पांच साल के दौरान सोनिया गांधी को पूरी तरह अलग थलग कर दिया था, फिर भी इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के वफादार सारे नेता उनके संपर्क में रहे और मौका मिलते ही सोनिया गांधी को पार्टी में लेकर आए व अध्यक्ष बनाया।
इसके बाद लगातार वाजपेयी सरकार के दौरान इन सभी नेताओं अहमद पटेल, गुलाम नबी आजाद, जनार्दन द्विवेदी, मोतीलाल वोरा, अंबिका सोनी, सुशील कुमार शिंदे, ए.के. एंटनी, पी. चिदंबरम, दिग्विजय सिंह, आनंद शर्मा, कपिल सिब्बल, मुकुल वासनिक आदि ने सोनिया गांधी और कांग्रेस को मजबूत किया। नतीजा 2004 में कांग्रेस नेतृत्व की यूपीए सरकार बनी। लेकिन राहुल गांधी के विश्वासपात्रों ने पार्टी के सत्ता से हटते ही अपने रंग दिखाने शुरू कर दिए और अपने सत्ता तक पहुंचने के अपने रास्ते तलाशने लगे।
नतीजा यह हुआ है कि कांग्रेस के भीतर पार्टी और परिवार के प्रति वफादारी के मुद्दे पर रेखाएं खिंच गई हैं। पुराने नेता सोनिया के प्रति वफादार हैं और उनके रहते किंकर्तव्यविमूढ़ हैं तो अपेक्षाकृत युवा नेता राहुल को फिर से पार्टी की कमान सौंपने के पक्षधर हैं।