इन दिनों कुछ सवाल आम हैं जैसे कि अप्रैल-मई 2019 में संभावित लोकसभा चुनाव का ऊंट किस करवट बैठेगा। मोदी दोबारा प्रधानमंत्री बनेंगे या नहीं। क्या मोदी के बिना भी भाजपा गठबंधन की सरकार किसी और के नेतृत्व में बन सकती है या फिर विपक्षी गठबंधन वैसी ही खिचड़ी पकेगी जैसी 1989 में राजीव गांधी सरकार की हार और कांग्रेस के सबसे बड़े दल के रूप में आने के बावूजद विपक्षी दलों ने विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में गठबंधन सरकार बनाकर पकाई थी।
जो भाजपा का पलड़ा भारी देखते हैं उनके पास दो तर्क हैं। पहला कि विपक्ष के पास नरेंद्र मोदी की कोई काट नहीं है। दूसरे मोदी इतने बड़े सियासी जादूगर हैं कि आखिर में कुछ न कुछ एसा करेंगे कि हवा उनके पक्ष में पलट जाएगी। जो भाजपा को हारता हुआ देख रहे हैं, उनका कहना है कि भाजपा सिर्फ मोदी के करिश्मे पर निर्भर है और मोदी न सिर्फ अपना करिश्मा तेजी से खोते जा रहे हैं बल्कि उनके तरकश के सारे तीर खत्म हो चुके हैं,इसलिए अब नया कुछ करके हवा अपने पक्ष में पलटने में कामयाब नहीं हो सकेंगे।
अब यह पूरी तरह साफ होता जा रहा है कि अगला लोकसभा चुनाव धार्मिक ध्रुवीकरण बनाम जातीय गोलबंदी के बीच होगा। सत्तारूढ़ भाजपा गठबंधन को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकास और सुशासन मॉडल से ज्यादा हिंदुत्व की धार पर भरोसा है,तो वहीं मोदी की भाषण की जादूगरी की काट न खोज पाने वाले विपक्ष को लगता है कि भाजपा और संघ ब्रांड के हिंदुत्व ध्रुवीकरण का मुकाबला सिर्फ जातीय गोलबंदी और सामाजिक समीकरणों के गणित से ही किया जा सकता है।
इसीलिए एक तरफ गौरक्षा के नाम पर होने वाली भीड़ हिंसा और भीड़ हत्या को लेकर केंद्रीय मंत्रियों से लेकर भाजपा के नेताओं तक के जो बयान आ रहे हैं,उनसे कोशिश हिंदुत्व के ध्रुवीकरण की ही है।अब ताजा मामला असम के नेशनल रजिस्ट्रर ऑफ सिटीजन्स (एनआरसी) का है। इसके मुताबिक असम में 40 लाख लोग अभी फिलहाल भारतीय नागरिक नहीं हैं। ये वो लोग हैं जो कई दशक पहले से बांग्लादेश से आकर असम में बस गए। ये सारे मुस्लिम हैं।भाजपा ने इसी तर्ज पर प.बंगाल और बिहार में भी अवैध घुसपैठियों की पहचान का नारा दे दिया है।
जाहिर है इस मुद्दे के जरिए भाजपा हिंदू ध्रुवीकरण की अपनी चुनावी राजनीति को और तेज करेगी। कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दल जितना ही असम के इन 40 लाख लोगों के समर्थन में खड़े होंगे और प.बंगाल और बिहार में एनआरसी का विरोध करेंगे, भाजपा को अपने पक्ष में इन राज्यों में भी हिंदुओं के गोलबंद होने की उम्मीद है। एक तरह से भाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ को अपना प्रमुख मुद्दा बनाने का फैसला कर लिया है।
भाजपा अपने प्रचार तंत्र के जरिए भारत में बेरोजगारी,अपराध, आतंकवाद जैसी तमाम समस्याओं का मूल कारण अवैध घुसपैठ को बताते हुए अपने वोट बैंक को मजूबत करने की कोशिश करेगी। मुहावरों की भाषा में इसे कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी से विपक्ष की कमर तोड़ी थी, अब एनआरसी के जरिए भाजपा ने अगले कुछ महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनावों और फिर अगले साल अप्रैल-मई में लोकसभा चुनावों में विपक्ष के वोटबंदी का दांव चला है।
भाजपा के इस दांव को विपक्ष समझ रहा है। इसलिए उसने बेहद सधे तरीके से इसकी काट शुरु कर दी है।40 लाख अवैध घुसपैठियों के मुद्दे को विपक्ष ने भाजपा सरकार की विफलता से जोड़ना शुरु कर दिया है। प.बंगाल में एनआरसी की बात भाजपा द्वारा उठाने से ममता बनर्जी बिफर गई हैं। बसपा अध्यक्ष मायावती ने भाजपा पर हमला करते हुए उसे दलित पिछड़ा और मुस्लिम विरोधी करार देना शुरु कर दिया है।
कांग्रेस इसे केंद्र सरकार की विफलताओं से लोगों का ध्यान भटकाने वाला कदम बता रही है। इसके अलावा विपक्ष को आरक्षण को लेकर महाराष्ट्र में मराठा आंदोलन, गुजरात में पटेल, राजस्थान में गूजरों और हरियाणा में जाटों भीतर सुलगते असंतोष से खासी उम्मीद है। विपक्ष को उम्मीद है कि भाजपा के हिंदुत्व की काट सिर्फ जातीय गोलबंदी से ही हो सकती है।इसलिए एक तरफ कांग्रेस अपने गठबंधन को दुरुस्त करने जुट गई तो दूसरी तरफ उसका मौन समर्थन महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा में आरक्षण मांगती जातियों के आंदोलन और असंतोष को भी है।
इसके अलावा विपक्ष को सबसे ज्यादा उम्मीद देश भर में दलितों पर पिछले कुछ वर्षों में हुई दमन और अत्याचार की अनेक घटनाओं को लेकर उनके भीतर पनप रहे गुस्से से भी है। विपक्ष को लगता है कि दलितों में केंद्र सरकार और भाजपा के खिलाफ बढ़ रहा गुस्सा उसके हिंदुत्व की धार को न सिर्फ कुंद करेगा बल्कि बेअसर भी कर देगा।दलित संगठनों द्वारा नौ अगस्त को फिर भारत बंद के आह्वान को लेकर सरकार में बेचैनी है तो एनडीए में शामिल दलित नेताओं के पैरों तले जमीन खिसकी हुई है।
अखिल भारतीय अंबेडकर महासभा के आह्वान पर देश भर के अनेक दलित और आदिवासी संगठनों ने अपनी अनेक मांगों को लेकर नौ अगस्त के दिन एक बार फिर भारत बंद का आह्वान किया है। अखिल भारतीय अबेंडकर महासभा के अध्यक्ष अशोक भारती ने केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान को एक लंबा पत्र लिखकर दलितों की मांगों की एक लंबी फेहरिस्त दी, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कमजोर हुए दलित एक्ट को फिर से मजूबत बनाने के लिए संसद में विधेयक पारित कराने से लेकर सहारनपुर के भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर रावण और उनके साथियों तथा पिछले भारत बंद के दौरान गिरफ्तार किए गए दलित कार्यकर्ताओं की रिहाई से लेकर दलितों से जुड़े अनेक मुद्दे शामिल हैं।
पासवान ने इस पत्र के साथ अपनी तरफ से एक पत्र गृहमंत्री राजनाथ सिंह को लिखकर सरकार से इन मुद्दों पर ध्यान देने की मांग की है। रामविलास पासवान और उनके सांसद पुत्र चिराग पासवान लगातार सरकार पर दलितों के मुद्दों को लेकर दबाव बनाने में जुटे हैं। इनके अलावा केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले, उपेंद्र कुशवाहा और भाजपा सांसद उदित राज भी अपना असंतोष जाहिर कर चुके हैं। भाजपा गठबंधन के भीतर चल रही इस खदबदाहट से भी विपक्ष को लगता है कि दलितों के सवाल पर भी भाजपा को बैकफुट पर लाने में विपक्ष कामयाब हो सकेगा।
अपने हिंदुत्व की धार तेज करने के लिए भाजपा के पास गौरक्षा, एनआरसी और अवैध घुसपैठ, कश्मीर में आतंकवाद, तीन तलाक और हलाला के अलावा एक और मुद्दा है अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का, जिसकी सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में नियमित रूप से चल रही है। अगर सुप्रीम कोर्ट अक्टूबर नवंबर तक इस मामले में कोई एसा फैसला दे देता है जिसे भाजपा अपने पक्ष में भुना सके, तो निश्चित रूप से उसे अपने हिंदुत्व ध्रुवीकरण के कार्ड को और तेज करने में मदद मिलेगी।
लेकिन अगर आम चुनाव तक इस मामले में कोई फैसला नहीं आ सका तो भाजपा के लिए विश्व हिंदू परिषद समेत तमाम हिंदू संगठनों और संत समाज को जवाब देना भारी हो जाएगा कि पूर्ण बहुमत की केंद्र सरकार और 20 राज्यों में अपनी और अपने समर्थक गठबंधनों की सरकार होने के बावजूद भाजपा राम मंदिर क्यों नहीं बना पाई। तब विपक्ष भी इस मुद्दे का इस्तेमाल भाजपा की विफलता के रूप में गिनाने के लिए करेगा। इसलिए अभी 2019 के चुनावों को लेकर मैदान में दोनों टीमें बराबरी पर हैं। सियासत के कुरुक्षेत्र में सरकार और विपक्ष दोनों आमने सामने हैं। अब महाभारत कौन जीतेगा इसका फैसला आने वाले सात आठ महीनों में इससे तय होगा कि कौन अपने पत्ते कितने बेहतर ढंग से खेलता है।