नागी युद्ध स्मारक स्थल पर बंदूक से निशाना लगाना सीखते छात्र।
- फोटो : अमर उजाला
करीब 10 घंटे के रोमांचक सफर के बाद 23 अपैल को हम सब सुबह करीब पौने आठ बजे श्रीगंगानगर सैनिक छावनी पहुंचे। वहां सेना की तरफ से सबके रुकने और ठहरने की बहुत ही सुंदर व्यवस्था थी। कैंट में पहुंचते ही सेना के जवानों और अधिकारियों ने हमारा स्वागत किया और सबको यथोचित आवास दिया गया। नहाने धोने और तरोताजा होकर सुबह दस बजे सबको एक बड़े मैदान में ले जाया गया। वहां लगे बैनर पर लिखा था 'अपनी सेना को जानिये' (नो योर आर्मी)। मैदान में धूप से बचने के लिए लगाए गए तंबुओं में सेना द्वारा प्रयोग किए जाने वाले हर तरह के हथियारों की प्रदर्शनी थी। वहां मौजूद सैनिक अधिकारियों ने हमारा स्वागत किया और सबको सेना के हथियारों के बारे में विस्तृत जानकारी देते हुए एक एक हथियार उसे चलाने का तरीका उसकी मारक क्षमता और किस देश में बना है आदि जानकारी दी गई। इन हथियारों में पिस्टल, रिवाल्वर, मशीनगन, स्वचलित राईफलें, मोर्टार, संचार उपकरण, हथगोले समेत हर तरह के मारक हथियार शामिल थे। यहां तक कि तोप और टैंक भी दिखाए गए और उनके बारे में विस्तार से बताया गया।
साथ ही बच्चों और अभिभावकों के लिए कॉफी चाय और नींबूपानी के साथ ठंडे पानी का भी इंतजाम था। यहां के बाद सबको एक मैदान में ले जाया गया। वहां पहले से ही खड़े एक विशाल टैंक में बारी बारी से समूह बनाकर बच्चों और उनके अभिभावकों को टैंक की सवारी कराकर उन्हें घुमाया गया। यह उनके लिए एक बेहद ही रोमांचक क्षण था। ऐसा क्षण कि छात्र छात्राएं और उनके अभिभावक कड़ी धूप और गर्मी भी भूल गए। टैंक की सवारी के बाद सभी छात्र छात्राओं का सेना के चिकित्सकों ने स्वास्थ्य परीक्षण भी किया और उन्हें स्वस्थ रहने के नुस्खे भी बताए।
दोपहर के भोजन के बाद बसों में बैठकर हम सब करीब डेढ़ घंटे का सफर करके पंजाब के फजिल्का में 1971 के युद्ध के शहीदों के स्मारक पहुंचे। बेहद शानदार तरीके से बनाए और सजाए गए इस युद्ध स्मारक का इतिहास भी उतना ही गौरवपूर्ण और शानदार है। यहां 1971 के युद्ध के दौरान पाकिस्तान की सेना ने आगे बढ़कर फजिल्का पर कब्जा कर लिया था। लेकिन भारत के जांबाज सैनिकों ने 14 दिनों तक उनसे कड़ा युद्ध करके उन्हें खदेड़ा और फजिल्का को वापस छीन लिया। इस लड़ाई में जिसे बैटल ऑफ फजिल्का के नाम से जाना जाता है भारतीय सेना के कई बहादुर सैनिक शहीद हुए जिन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए इस स्मारक को बनाया गया। सेना के अधिकारियों ने सभी बच्चों से शहीदों को पुष्पांजलि अर्पित कराई, स्मारक में दर्ज युद्ध के ब्यौरे और शहीदों की तस्वीरों से परिचित कराया और फिर उन्हें इस लड़ाई की विस्तार से जानकारी दी।
दूरबीन से सीमा पार निरीक्षण
- फोटो : Amar Ujala
बच्चे बेहद अभिभूत और रोमांचित थे। वह साक्षात देशभक्ति और शहादत से रूबरू थे। अभी तक यह बातें वह किताबों में ही पढ़ते रहे थे, लेकिन अब सब कुछ प्रत्यक्ष था। यहां से शहीदों की याद में आंखें नम करते हुए हम फिर आगे बढ़े और करीब आठ किलोमीटर दूर सादकी बार्डर पर पहुंचे। यह बॉर्डर भारत पाकिस्तान सीमा का वैसा ही स्थल है जैसा कि पंजाब में अमृतसर के पास स्थित वाघा अटारी बॉर्डर। यहां कटीले तारों के उस पार अंतरराष्ट्रीय सीमा और फिर पाकिस्तान की जमीन को देखना एक मिला जुला अहसास कराता है। धरती के बंटने का दुख और अपनी सेना और बीएसफ के जवानों की मुस्तैदी का सुख के दोहरे अहसास के साथ हम सबको वहां बनाए गई दर्शक दीर्घा में बिठाया गया। कंटीले तारों के दूसरी तरफ बिल्कुल इसी तरह बनी दर्शक दीर्घा में पाकिस्तानी नागरिक और बच्चे बैठे हुए थे। मौका था वाघा की ही तरह बीएसफ और पाकिस्तानी रेंजर्स जो वहां सीमाओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाला बल है की संयुक्त लेकिन अपने अपने क्षेत्र में अलग अलग परेड का।
बेहद शानदार तरीके से शुरु हुई यह परेड जो दोनों देश अपने अपने राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान में करते हैं और इसके बाद ससम्मान झंडे को उतारा जाता है। परेड के दौरान सीमा के दोनों तरफ जमा लोग अपने अपने देश का नारा बुलंद कर रहे थे। लेकिन हमारे बच्चों का उत्साह देखने काबिल था। पाकिस्तान से अगर एक नारा आता था जो जवाब में इधर से तीन नारे भारत माता की जय वंदे मातरम और हिंदुस्तान जिंदाबाद लगातार गूंजते थे। बच्चों के इस उत्साह से सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के जवानों का हौसला भी बुलंद होता रहा। परेड के बाद उत्साह से लबरेज छात्र छात्राओं ने सीमा पर जवानों के साथ अपने फोटो खिंचवाए। सामूहिक फोटोग्राफी भी हुई। शाम का धुंधलका छाने लगा था और बच्चों के साथ बसों में बैठकर हम सब गंगानगर लौट रहे थे। कैंट में पहुंचकर रात के खाने के बाद सब आराम के लिए चले गए, क्योंकि अगले दिन सुबह छह बजे हमें नागी बार्डर पोस्ट के लिए निकलना था।
24 अप्रैल की सुबह छह बजे बच्चों के साथ हम रवाना हो गए नागी बॉर्डर के लिए। राजस्थान के इस सीमावर्ती गांव की दूरी तय करने में करीब दो घंटे का वक्त लगा। पहले हाई वे फिर सिंगल रोड और फिर टेढ़े मेढे घुमावदार रास्तों से होते हुए नागी गांव पार करके जब हम सेना की इस सीमा चौकी पर पहुंचे तो नजारा देखने काबिल था। भारतीय सेना कैसे जंगल में मंगल करती है यह हम प्रत्यक्ष देख रहे थे। एक छोटी सी चौकी जो रेगिस्तानी जमीन पर पाकिस्तान की सीमा से महज दो किलोमीटर पहले स्थित है वहां देवी के मंदिर के भीतर स्थित शहीद स्मारक की सजावट, बाहर करीब 72 फीट ऊंचे ध्वज स्तंभ के चारो तरफ तिरंगे की आभा वाली साज सज्जा, लोगों के बैठने के लिए शानदार टेंट और अतुल महेश्वरी छात्रवृत्ति सम्मान समारोह के आयोजन के लिए बेहद खूबसूरत वातानुकूलित पांडाल की शोभा देखते बनती थी। पूरे परिसर को तिरंगे की थीम से सजाया गया था। इस माहौल में बॉर्डर फिल्म के सदाबहार गीत संदेशे आते हैं ने वातावरण को देशभक्ति और सैन्य गौरव से भरपूर कर दिया था।
नागी बॉर्डर एक दिन पहले देखे गए सादकी बॉर्डर से अलग तरह का है। यहां दोनों देशों की सीमाओं को बांटने वाली लोहे के तारों की बाड़ कुछ दूरी पर है और कोई गेट नहीं है। दूर दूर तक सपाट रेतीला मैदान है। बच्चे बेहद रोमांचित भी थे, उत्साहित भी। हमारे पहुंचते ही सेना के जवानों और अधिकारियों ने बेहद गर्मजोशी से हमारा स्वागत किया। सबसे पहले उन्होंने पंक्तिबद्ध होकर मंदिर परिसर में शहीद स्मारक पर पुष्पांजलि अर्पित की। फिर बच्चों और उनके अभिभावकों को 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध में नागी की लड़ाई के बारे में बताया गया। इसके लिए उन्हें उस कक्ष में ले जाया गया, जहां उस युद्ध की अनेक स्मृतियां संजोकर रखी गई हैं। बताया गया कि 16 दिसंबर 1971 को भारत पाकिस्तान के बीच युद्ध विरान के 10 दिन बाद 26 दिसंबर को धोखे से पाकिस्तानी सेना की एक टुकड़ी ने हमला करके नागी गांव और इलाके को अपने कब्जे में ले लिया। जब गांव वालों से इसकी जानकारी मिली तो तत्काल भारतीय सेना के जांबाज सैनिकों ने उनसे दो दिन तक भीषण युद्ध करके 28 दिसंबर को पाकिस्तानी सैनिकों के कब्जे से नागी इलाके को मुक्त करा लिया। इसमें स्थानीय जनता ने भी सेना की मदद की और हमारे 21 वीर सैनिक शहीद हुए। अधिकारियों ने बताया कि इस जीत की याद में स्थानीय जनता ने अपने खर्चे पर विजय स्मारक का निर्माण किया, जिसकी देख रेख और रखरखाव सेना करती है।
इसके बाद छात्र छात्राओं को कुछ दूरी पर बने बंकर दिखाए गए और वहीं उन्हें तीरंदाजी और एअरगन शूटिंग से निशानेबाजी का अभ्यास कराया गया। करीब दो घंटे के इस कार्यक्रम के बाद बच्चे और उनके अभिभावक नियत स्थान पर आकर बैठ गए। करीब पौने दस बजे सेना के हेलीकॉप्टरों की गड़गड़ाहट से आसमान गूंज उठा। पहले दक्षिणी पश्चिमी कमान (सप्त शक्ति कमान) के कोर कमांडर लेफ्टीनेंट जनरल नागेंद्र चौहान का हैलीकॉप्टर उतरा। उसके कुछ देर बाद दक्षिण पश्चिमी कमान (सप्त शक्ति कमान) के जीओसी इन्चार्ज आर्मी कमांडर लेफ्टीनेंट जनरल मनजिन्दर सिंह अपने स्टाफ के साथ उतरे। हेलीपैड से से दोनों सैन्य कमांडर और अन्य सैनिक अधिकारी समारोह स्थल पहुंचे। उनके साथ मेजर जनरल एन आर जाखड़ मेजर जनरल कटोच ब्रिग्रेडियर प्रयोग सुब्बा और ब्रिगेडियर ईशपाल सिंह गिल समेत कई वरिष्ठ सैनिक अधिकारी साथ थे।
नागी युद्ध स्मारक में श्रद्धांजलि देते छात्र।
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सैन्य सलामी के साथ आर्मी कमांडर लेफ्टीनेंट जनरल मनजिंदर सिंह ने युद्ध स्मारक पर जाकर नागी की लड़ाई में शहीद हुए भारतीय सेना के 21 जांबाज सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित की। इसके बाद फ्लैग फाउंडेशन ऑफ इंडिया के सौजन्य से 72 फीट ऊंचे ध्वज स्तंभ पर विशालकाय तिरंगा फहराया गया। यह ध्वाजारोहण भी लेफ्टीनेंट जनरल मनजिंदर सिंह के हाथों संपन्न हुआ। ध्वाजारोहण के बाद आर्मी कमांडर कोर कमांडर और सभी अन्य सैनिक अधिकारी अतुल महेश्वरी छात्रवृत्ति समारोह में पधारे। बच्चे और उनके अभिभावक पहले ही वहां बैठ चुके थे। बेहद गौरवपूर्ण और गरिमामय तरीके से संपन्न हुए इस कार्यक्रम में लेफ्टीनेंट जनरल मनजिंदर सिंह ने हर बच्चे को अमर उजाला फाऊंडेशन की तरफ से अतुल महेश्वरी छात्रवृत्ति, प्रमाणपत्र और पुस्तकों का बंडल भेंट किया।
जनरल सिंह ने हर बच्चे से व्यक्तिगत रूप से बात करके उनका हौसला बढ़ाया। इसके बाद अपने संबोधन में लेफ्टीनेंट जनरल मनजिंदर सिंह ने बच्चों को सफलता के तीन मंत्र दिए कड़ी मेहनत, ईमानदारी और लगन। उन्होंने कहा कि वह खुद एक गांव के साधारण परिवार से यहां तक पहुंचे हैं तो इसके पीछे उनके यही तीनों मंत्र हैं। जनरल सिंह ने कहा कि बच्चे जिस क्षेत्र में जाना चाहें उसके लिए मेहनत करें और अगर सेना में आना चाहें तो उनका स्वागत है। कार्यक्रम के बाद जनरल सिंह जनरल चौहान समेत सभी सेना अधिकारियों ने बच्चों के साथ सामूहिक फोट खिंचवाई और साथ में ही नाश्ता किया। इस दौरान बच्चों ने सैनिक अधिकारियों के साथ खूब संवाद किया और सवाल भी पूछे।
छात्रवृत्ति समारोह के बाद हम सब वापस गंगानगर कैंट लौटे। दोपहर के भोजन और विश्राम के बाद शाम साढे चार बजे से सात बजे तक बच्चों और उनके अभिभावकों ने सेना के प्रेक्षागृह में जोश से भरपूर फिल्म 'उरी' देखी। यहां से निकल कर सब सब एरिया कमांडर ब्रिगेडियर प्रयोग सुब्बा द्वारा आयोजित बड़ा खाना में शामिल हुए जहां सैनिक अधिकारियों के परिजनों से भी बच्चों की मुलाकात हुई। शानदार बड़ा खाना में पहले संगीत हुआ फिर केरल की कलाई पट्टू, गोरखा खुखरी नृत्य और सिखों के मार्शल आर्ट के बेहद रोमांचक प्रस्तुतियां हुईं। बेहद कमाल की इन प्रस्तुतियों ने सबका मन मोह लिया। इसके बाद सामूहिक फोटोग्राफ और रात के खाने के बाद दिल में सेना के आतिथ्य अनुशासन जीवन शैली कामकाज और वीरता की यादें दिल में संजोए हम वापस दिल्ली नोएडा के लिए रवाना हो गए।
दो दिनों का यह बेहद रोमांचक अनुभव हम सबको तो याद रहेगा ही, लेकिन इसका सबसे ज्यादा असर उन छात्र छात्राओं पर पड़ता हुआ दिखा जो इतने करीब से अपनी सेना को देखने के बाद खुद भी भविष्य में उसका हिस्सा बनने का सपना देखने लगे हैं। कड़ी मेहनत लगन और ईमानदारी से उनका यह सपना जरूर पूरा होगा ऐसा विश्वास अमर उजाला फाऊंडेशन को है। साथ ही सेना की दक्षणी पश्चमी कमान के आर्मी कमांडर लेफ्टीनेंट जनरल मनजिंदर सिंह और उनकी पूरी सैनिक टीम का अमर उजाला फाउंडेशन और अमर उजाला समूह की ओर से हार्दिक आभार। जय हिंद जय हिंद की सेना।