‘डिजिटल के शुरुआती दौर में मुझे चिरकुट कवि बोलते थे’
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‘अब गूगल अपने हेडक्वार्टर पर मुझे बुला चुका है’
‘कैलीफोर्निया असेंबली ने मुझे बुलाकर सम्मानित किया’
‘राजनीति मेरा काम नहीं, युगधर्म है!’
विश्वास कुमार शर्मा यानि कुमार विश्वास ने हिंदी कविता के पुनर्जीवन का इन दिनों बीड़ा उठाया हुआ है। डिजिटल वर्ल्ड के वह सबसे मशहूर कवि हैं। इंटरनेट के भारत आने के बाद से ही वह डिजिटली एक्टिव रहे हैं। लेकिन तब ऑरकुट पर होने की वजह से लोग उन्हें चिरकुट कवि कहा करते थे। लेकिन, आज वह डिजिटल के मोस्ट सेलिब्रेटेड कवि हैं। और, फॉलोअर्स के मामले में वह ट्विटर और फेसबुक पर बड़ी बड़ी फिल्मी हस्तियों को टक्कर देते हैं।
अमर उजाला टीवी के साप्ताहिक कार्यक्रम “शुक्ल पक्ष” में इस रविवार कुमार विश्वास खास मेहमान रहे। उन्होंने कई निजी और व्यावसायिक मुद्दों पर खुलकर बात की। इन दिनों टेलीविजन पर मशहूर हो रहे कार्यक्रम महाकवि से बातचीत की शुरुआत करने पर उन्होंने कहा, एक पूरी युवाओं की पीढ़ी 2002 से कवि संम्मेलनों में मेरे माध्यम से आई लेकिन वो पीढ़ी मुझ तक ठहर गई। हम सब के पाठ्य क्रम में पंत, प्रसाद, निराला, महादेवी, दिनकर, अज्ञेय सब रहे पर, अलग अलग प्रोफेशन्स में जाने के बाद हम इन सबको भूल गए। तो एक तरीके से मुझ जैसे सामान्य वंशज का ये प्रणाम है अपने पूर्वज के नाम। ये एक तरह से तर्पण हैं। हम सनातनी संकार के लोग हैं । हमारे यहां यह माना जाता है कि पितृ अगर असंतुष्ट हो तो जीवन में प्रगति नहीं होती है।
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24-25 कवियों ने लिखित रूप से मेरा विरोध कियाः कुमार विश्वास
कवियों की बात चलने पर जब कुमार विश्वास से उनके उस शुरुआती दौर के बारे में पूछा गया जब उनको मंच पर बिठाने को लेकर लोगों ने बहुत विरोध किया, विश्वास ने कहा, मुझे लगता है कि अगर वो ऐसा ना करते तो मैं जहां हूं वहां ना होता क्योंकि 2002 के आस-पास जब मैंने कवि संम्मेलनों को व्यावसायिक रुप से देखना शुरू किया तो लगभग 24-25 कवियों ने लिखित रूप से मेरा विरोध किया कि जहां-जहां कुमार विश्वास आयेगा हम नहीं आयेंगे।
2007 तक ये चला, बड़े कष्ट के वर्ष थे ये। अब आलम ये है कि मेरी लोकप्रियता को देख कैलीफोर्निया एसेंबली ने मुझे सम्मानित किया। गूगल ने अपने हेडक्वार्टर पर बुलाया। और, एक वह समय था जब मैं मैं आरकुट पर था तो पहले के कवि मुझे चिरकुट बोलते थे। चिरकुट वाला कवि । बाद में ये लोग फिर खुद ही फेसबुक पर आये, वो खुद ही ट्विटर पर आये। आज वो हमसे डिजिटल के बारे में पूछते हैं कि कैसे करते हैं ये सब।
डिजिटल के दौर में हिंदी कविता के पुनर्जीवन के बारे में कुमार विश्वास कहते हैं, मैं सोचकर नहीं लिखता। पहले ही दिन से एक नियम बनाया कि कविता का बाजार बनायेंगे, बाजार की कविता नहीं लिखेंगे। इंटरनेट के माध्यम से बहुत सारे लोग हैं जो पढ़े सुने जा रहे है। इनको लोग फॉलो करते हैं। इनकी कविताऐं पढ़ रहें हैं। बस मैं यही चाहता था कि कविता का जो गुरुकुल, कुरुकुल में सिमट गया था दिल्ली में। वह लोकतांत्रिक हो जाए। दिल्ली में कुछ मठाधीश थे, मुंबई में कुछ मठाधीश थे। ये तय करते थे कि आने वाले कल का लालकिले पर पढ़ने वाला कवि कौन होगा।
अमर उजाला टीवी के इस कार्यक्रम में कुमार विश्वास ने इस राज से भी पर्दा उठाया कि आखिर उनकी सबसे मशहूर कविता “कोई दीवाना कहता है” का जन्म कैसे हुआ? कुमार बताते हैं, जब मैं ग्रैजुएशन फाइनल इयर में था तो जिससे प्रेम था वह गर्ल्स कॉलेज में पढ़ती थी। उन तक पहुंचना मुश्किल था, मैं कॉलेज की दीवार फांदकर उनसे मिलने गया तो उसने मुझसे कहा कि तुम पागल हो क्या? उसके बाद जब मैं बाहर निकला तो एक साइकिल वाले से टकरा गया। उसने मुझसे कहा, दीवाना है क्या? तो जब मैं दोस्त के साथ स्कूटर पर पीछे बैठकर जा रहा था तो सोच रहा था कि मैं कितना पढ़ता लिखता रहता हूं। टॉपर हूं क्लास का, प्रोफेसर का बेटा हूं। डिबेट बोलता हूं। ये क्या मेरी हालत हो गई है प्रेम में कि वो पागल कह रही है ये दीवाना कह रहा है। तो कोई पागल कहता है तो कोई दीवाना कहता है। तो यहा से पहली पंक्ति निकली।
राजनीति की चर्चा करने पर कुमार विश्वास ने बिल्कुल बेलौस होकर इस पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा, राजनीति मेरा काम नहीं है। युगधर्म है। अपनी पार्टी में मैंने कभी कोई पद नहीं लिया। मैंने अपनी पार्टी की चवन्नी भी खर्च नहीं की। विधानसभा का पानी तक नहीं पिया है। मैं चाहता हूं कि इसी मुद्रा में मैं रहूं। मैं कोशिश करता रहूं कि जो काम करने की कोशिश हम लोग कर रहे हैं। दोस्त कर रहे हैं, अरविंद कर रहे हैं, मनीष कर रहे हैं, वे और आगे बढ़े। कमियां सब में हैं। हम में, उनमें है, जो शीर्ष पर हैं उनमें भी है। लेकिन बीच में ऐसा सौहार्द्र का सेतु रहे जो देश को बनाने वाले सारे लोग चाहे केंद्र में हो चाहे राज्य में हो। चाहे भाजपा में हो, कांग्रेस में हो सब मिलकर अंतत: इस देश के हित के बारे में सोचें।