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टीएमसी में रार: 'शहीद दिवस' मनाने के लिए दोनों धड़े आमने-सामने, क्या पुलिस देगी 21 जुलाई की रैली को मंजूरी?

Sun, 28 Jun 2026 07:04 PM IST
राकेश कुमार एएनआई, कोलकाता।

सार

कोलकाता में 21 जुलाई को शहीद दिवस रैली आयोजित करने के लिए टीएमसी के ममता बनर्जी गुट और बागी धड़े ने पुलिस से अनुमति मांगी है। ममता गुट के नेताओं ने बागियों के दावों को अवैध बताते हुए लालबाजार साइबर सेल में शिकायत दर्ज कराई है, जबकि सांसद महुआ मोइत्रा ने हर हाल में रैली करने का एलान किया है।
 
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कुणाल घोष, टीएमसी विधायक - फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता का एस्प्लेनेड इलाका एक बार फिर भारी सियासी घमासान का गवाह बनने जा रहा है। आगामी 21 जुलाई को मनाए जाने वाले वार्षिक 'शहीद दिवस' को लेकर तृणमूल कांग्रेस के दोनों गुटों में ठन गई है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले मूल दल और बागी गुट, दोनों ने ही इस दिन विक्टोरिया हाउस के सामने विशाल रैली आयोजित करने के लिए कोलकाता पुलिस से औपचारिक अनुमति मांगी है। इस खींचतान ने राज्य की कानून-व्यवस्था और पुलिस प्रशासन के सामने एक बेहद संवेदनशील स्थिति पैदा कर दी है।
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ममता बनर्जी गुट ने क्या कहा? 
ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले आधिकारिक गुट ने बागी धड़े के दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। इस सिलसिले में टीएमसी विधायक और प्रवक्ता कुणाल घोष ने इतिहास का हवाला देते हुए तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि साल 1993 में ममता बनर्जी ने 'नो आईडी कार्ड, नो वोट' का ऐतिहासिक नारा बुलंद किया था। उस दौरान सीपीएम की सरकार ने बर्बरता की हदें पार करते हुए उनके कार्यकर्ताओं पर गोलियां चलवाई थीं। यहां तक कि ममता दीदी की हत्या की कोशिश भी की गई थी।

कुणाल घोष का कहना है कि इसी ऐतिहासिक घटना के बाद से ममता बनर्जी हर साल 21 जुलाई को शहीद कार्यकर्ताओं को श्रद्धांजलि देती आ रही हैं। उन्होंने प्रशासन पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब योग दिवस के लिए रेड रोड जैसी मुख्य सड़क को सात दिनों तक बंद रखा जा सकता है, तो शहीदों को नमन करने वाले इस कार्यक्रम के लिए कुछ घंटों की अनुमति क्यों नहीं मिल सकती? उन्होंने कहा कि पार्टी और जनता ने पुलिस को पत्र भेज दिए हैं। बागी गुट को पार्टी के नाम और प्रतीकों का इस्तेमाल करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। उनके खिलाफ पुलिस में शिकायत भी दर्ज करा दी गई है।
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चुनाव आयोग के फैसले से पहले ही दावेदारी क्यों? 
इस विवाद पर टीएमसी की वरिष्ठ सांसद डोला सेन ने भी बागी गुट को आड़े हाथों लिया है। उन्होंने बताया कि साल 1993 के उस खूनी संघर्ष में उनके 13 साथियों ने अपनी जान गंवाई थी। इसके बाद साल 1994 से, यानी पिछले 33 वर्षों से वे लगातार हर 21 जुलाई को शहीद दिवस मनाते आ रहे हैं। यह उनके लिए कोई नया आयोजन नहीं बल्कि एक पवित्र परंपरा है।

सांसद डोला सेन ने बागी गुट की कानूनी वैधता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि मीडिया के जरिए यह जानकारी मिली है कि बागी गुट ने चुनाव आयोग का दरवाजा खटखटाया है। वे पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर अपना हक जता रहे हैं। लेकिन जब तक चुनाव आयोग का कोई अंतिम फैसला नहीं आ जाता, तब तक वे खुद को असली टीएमसी कैसे कह सकते हैं? उनकी बैठकें और झंडे-बैनरों का उपयोग पूरी तरह गैरकानूनी है। इसी जालसाजी और धोखाधड़ी को देखते हुए डोला सेन ने खुद लालबाजार के साइबर क्राइम विभाग में एक लिखित शिकायत दर्ज कराई है।

बागी गुट का तर्क क्या? 
दूसरी तरफ, बागी गुट का दावा है कि वे ही असली तृणमूल कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनका आरोप है कि वर्तमान नेतृत्व शहीदों के परिवारों को भूल चुका है। इस बार वे फिल्मी सितारों को तवज्जो देने के बजाय आंदोलन के असली शहीद परिवारों को मंच पर सम्मानित करेंगे।
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महुआ मोइत्रा ने क्या चुनौती दी? 
इस बीच, ममता गुट की तेजतर्रार सांसद महुआ मोइत्रा ने भी बागी गुट को खुली चुनौती दी है। मोइत्रा ने कहा है कि चाहे प्रशासनिक पाबंदियां कितनी भी क्यों न हों, 21 जुलाई की ऐतिहासिक रैली हर हाल में होकर रहेगी। अगर उन्हें मुख्य मंच बनाने की अनुमति नहीं भी मिलती है, तो वे पीछे नहीं हटेंगी। वे किसी गाड़ी पर खड़े होकर ही माइक थामेंगी और जनता को संबोधित करेंगी, लेकिन शहीदों का अपमान बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। कोलकाता पुलिस अब दोनों पक्षों की अर्जियों को लेकर कानूनी और सुरक्षा पहलुओं की समीक्षा कर रही है। हालांकि, अब सवाल यह उठ रहा है कि कोलकाता पुलिस किस गुट को रैली की अनुमति देगी? 
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