पेट पालने के लिए सेलिना ने भी रोजाना मजदूरी शुरू कर दी। लेकिन जब आर्थिक कठिनाइयां उन पर बोझ बनने लगीं तो उन्होंने श्मशान में बतौर हेल्पर काम करना शुरू कर दिया। शुरू के चार साल उन्होंने बतौर हेल्पर काम किया और श्मशान में शवों को जलाने में मदद करने लगीं। सेलिना ने बताया कि उनकी बच्चियों ने उन्हें यह काम करने से कभी नहीं रोका लेकिन उनके भाई नहीं चाहते थे कि वह यह काम करें। लेकिन जब सेलिना ने अपने भाई से पूछा कि क्या वो उनके खर्चे उठाएंगे, क्या वो उनका कर्ज उतारेंगे? तो उनके भाई ने उन्हें रोकना बंद कर दिया।
सेलिना ने बताया कि श्मशान के केयरटेकर के रिटायर होने के बाद उन्होंने श्मशान को चलाने का टेंडर लिया। एक शव की अंतिम क्रिया में 1500 रुपयों का खर्च आता था जिसमें नगरपालिका को 405 रुपये बतौर शुल्क देने होते थे। जिसके बाद उन्हें लकड़ियों और बाकी की सामग्री पर भी खर्च करना पड़ता था जिसमें बहुत कम मुनाफा होता था। यह वह दिन थे जब उन्हें दिन के 4 शव मिल जाया करते थे। लेकिन नवंबर-दिसंबर का महीना पूरी तरह खाली गया था। जिसमें बहुत कम शव आये थे। हंसते हुए सेलिना कहती हैं कि पता नहीं क्यों भगवान कभी-कभी हमारी मदद नहीं करता।
सेलिना यह स्वीकार करती हैं कि यह काम बहुत कठिन है लेकिन उन्हें इस बात को कोई मलाल नहीं है। लोगों के शवों को जलाकर ही उन्होंने अपनी दोनों बेटियों को शिक्षा दिलवाई और दोनों की शादी का भी इंतजाम किया। उन्होंने बताया कि उनकी छोटी बेटी के बच्चे कभी-कभी उनकी मदद करते हैं लेकिन बड़ी बेटी के बच्चे श्मशान में आने से डरते हैं।
सेलिना जिंदगी और मौत पर कुछ कहना नहीं चाहतीं, वह बस इतना जानती हैं कि अगर उन्हें इस बार श्मशान का टेंडर नहीं मिला तो जो भी टेंडर पायेगा, वो उन्हें भी नौकरी देगा।