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एक किलो वजन के बच्चे का सफल ऑपरेशन कर कोच्चि के अस्पताल ने रचा इतिहास

Thu, 09 Nov 2017 06:50 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर
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यूं तो चिकित्सा जगत में देश का दक्षिणी इलाका हर दिन कोई न कोई मुकाम हासिल कर रहा है। लेकिन शिशुओं के मामले में भी अब यहां के अस्पताल भी चिकित्सा जगत के असंभव से लगने वाले केस सुलझाने लगे हैं। हाल ही में कोच्चि के अमृता इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस (एम्स) ने एक ऐसे बच्चे का ऑपरेशन कर जीवन दिया है, जिसका वजन महज एक किलोग्राम था। इस 28 सप्ताह की आयु वाले शिशु के शरीर में शुद्घ रक्त बनने की प्रक्रिया प्रभावित थी। हृदय से फेफड़ों में रक्त ले जाने वाली धमनियां काम नहीं करती थीं। इसके अलावा दोनों हाथों का प्रत्यारोपण कर यह भारत का पहला संस्थान भी बन गया है। 
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बुधवार को दिल्ली आए डॉक्टरों के अनुसार, शिशु का हृदय, एक आम इंसान की मुट्ठी का 28वें हिस्से के बराबर था, जिसे सर्जरी के जरिये ठीक कर पाना डॉक्टरों के लिए आसान नहीं था। 29 सप्ताह में इस बच्चे ने जन्म लिया था। करीब 16 घंटे चले 30 डॉक्टरों की टीम ने पहले बच्चे के हृदय के हिस्से में अविकसित धमनी का निर्माण किया फिर उसे फेफड़े में जुड़ने वाली मुख्य धमनी से जोड़ दिया। अब बच्चे के शरीर में अच्छे और गंदे रक्त संचारण की प्रक्रिया सामान्य हो गई है। 

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इस अस्पताल के हृदय वक्र तंत्रिका शल्य विज्ञान विभाग के प्रमुख डॉ. संजीव सिंह बताते हैं कि वैसे तो यह केस नया नहीं है। देश में हर 30 हजार शिशुओं में से एक को इस तरह की बीमारी होती है। लेकिन इन शिशुओं की मृत्युदर 100 फीसदी है। इतनी कम उम्र और हल्का वजन होने के कारण शिशु का शरीर ऑपरेशन को झेल नहीं पाता है। इसी वजह से उसकी मौत हो जाती है। लेकिन कन्नूर निवासी इस बच्चे का साहस और प्रतिरोधक क्षमता काफी सहायक बनी। 
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उन्होंने बताया कि सामान्य शिशु जन्म लेने के बाद करीब साढ़े तीन से चार किलोग्राम के वजन का होता है, जबकि इस तरह के बच्चों का वजन कम होने की वजह से मृत्यु की आशंका और भी ज्यादा बढ़ जाती है।
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हाथों का प्रत्यारोपण कर बनाए रिकॉर्ड 

प्रतीकात्मक फोटो
वहीं, प्लास्टिक एंड रिकन्स्ट्रक्टिव सर्जरी के प्रोफेसर डॉ. मोहित शर्मा ने बताया कि हाथ प्रत्यारोपण को लेकर भी नए रिकॉर्ड देश में स्थापित किए हैं। इसमें हाल ही में एक पुणे निवासी युवती श्रेया को पुरुष के दोनों हाथ देकर उसे एक प्रकार का नया जीवन दिया था।

उन्होंने बताया कि श्रेया के दोनों हाथों को ब्रेन डेड व्यक्ति के हाथों से प्रत्यारोपित किया। जबकि अन्य तीन घायलों को भी अन्य तीन ही ब्रेन डेड व्यक्तियों से मिले दोनों हाथों को प्रत्यारोपित किया है। इसमें एक ऐसा मामला भी है, जिसमें अफगान सेना में युद्ध के दौरान अपने दोनों हाथ गंवा चुके सिपाही को भारतीय ब्रेन डेड डोनर से प्राप्त दोनों हाथ प्रत्यारोपित किए गए। 

डॉक्टरों ने बताया कि श्रेया पुणे निवासी है। इंजीनियरिंग करने के लिए उसने मणिपाल विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया था। 19 वर्षीय श्रेया सिद्दानागौड़ा की सर्जरी के बाद उनकी देखभाल की जा रही है। इस जटिल सर्जरी को 25 सर्जनों और 12 एनीस्थिसिया विशेषज्ञों ने अंजाम दिया और इसमें 14 से 16 घंटे लगे। 
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