यूं तो चिकित्सा जगत में देश का दक्षिणी इलाका हर दिन कोई न कोई मुकाम हासिल कर रहा है। लेकिन शिशुओं के मामले में भी अब यहां के अस्पताल भी चिकित्सा जगत के असंभव से लगने वाले केस सुलझाने लगे हैं। हाल ही में कोच्चि के अमृता इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस (एम्स) ने एक ऐसे बच्चे का ऑपरेशन कर जीवन दिया है, जिसका वजन महज एक किलोग्राम था। इस 28 सप्ताह की आयु वाले शिशु के शरीर में शुद्घ रक्त बनने की प्रक्रिया प्रभावित थी। हृदय से फेफड़ों में रक्त ले जाने वाली धमनियां काम नहीं करती थीं। इसके अलावा दोनों हाथों का प्रत्यारोपण कर यह भारत का पहला संस्थान भी बन गया है।
बुधवार को दिल्ली आए डॉक्टरों के अनुसार, शिशु का हृदय, एक आम इंसान की मुट्ठी का 28वें हिस्से के बराबर था, जिसे सर्जरी के जरिये ठीक कर पाना डॉक्टरों के लिए आसान नहीं था। 29 सप्ताह में इस बच्चे ने जन्म लिया था। करीब 16 घंटे चले 30 डॉक्टरों की टीम ने पहले बच्चे के हृदय के हिस्से में अविकसित धमनी का निर्माण किया फिर उसे फेफड़े में जुड़ने वाली मुख्य धमनी से जोड़ दिया। अब बच्चे के शरीर में अच्छे और गंदे रक्त संचारण की प्रक्रिया सामान्य हो गई है।
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इस अस्पताल के हृदय वक्र तंत्रिका शल्य विज्ञान विभाग के प्रमुख डॉ. संजीव सिंह बताते हैं कि वैसे तो यह केस नया नहीं है। देश में हर 30 हजार शिशुओं में से एक को इस तरह की बीमारी होती है। लेकिन इन शिशुओं की मृत्युदर 100 फीसदी है। इतनी कम उम्र और हल्का वजन होने के कारण शिशु का शरीर ऑपरेशन को झेल नहीं पाता है। इसी वजह से उसकी मौत हो जाती है। लेकिन कन्नूर निवासी इस बच्चे का साहस और प्रतिरोधक क्षमता काफी सहायक बनी।
उन्होंने बताया कि सामान्य शिशु जन्म लेने के बाद करीब साढ़े तीन से चार किलोग्राम के वजन का होता है, जबकि इस तरह के बच्चों का वजन कम होने की वजह से मृत्यु की आशंका और भी ज्यादा बढ़ जाती है।