3500 तस्वीरों और तकनीकी डाटा से बनाया खतरे का नक्शा
लैडिंग के लिए उपयुक्त जगह के चुनाव में कई चंद्र मिशन के डाटा, तकनीकों और उपकरणों की मदद ली जा रही है। इसमें चंद्रयान-1 से मिला डाटा तो काम आया ही, नासा का लूनर रिक्गनसेंस ऑर्बिटर कैमरा, जापान के कागुया मिशन, डिजिटल एलिवेशन मॉडल (डीईएम) आदि से मिले डाटा व तस्वीरों का भी विश्लेषण किया जा रहा है। इससे पहले केवल ढलान और साये से बचाने के लिए चंदमा के दक्षिण ध्रुव की 3,500 तस्वीरों का भारतीय अंतरिक्ष विज्ञानियों ने विश्लेषण किया। साथ ही पूरे एक साल तक चंद्रमा पर नजर रखकर यहां होने वाली गतिविधियों को दर्ज किया और मिशन के लिए संभावित खतरे का नक्शा बनाया।
और अंतत: ...चंद्रमा के तीसवें अहाते में चुनी दो साइट्स
इस पूरी कसरत के बाद दो जगहों का चयन हुआ। इनमें पीएलएस 54 (प्राइम लैंडिंग साइट) को प्राथमिकता पर रखा गया है। यही साइट मैनजिनस सी और सिम्पेलियस एन के बीच में मौजूद मैदानी भाग है। वहीं एएलएस 01 (ऑल्टरनेट लैंडिंग साइट) को वैकल्पिक लैंडिंग साइट चुना गया है। ये दोनों ही जगहें एक दूसरे के निकट हैं और चंद्रमा के एलक्यू 30 अहाते में आती हैं। जिस प्रकार पृथ्वी की भूमि को सात महाद्वीपों में बांटा गया है, अमेरिकी भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण विभाग ने चंद्रमा को 30 अहातों में बांटा है।
चंद्रमा के इतिहास और संरचना का कोष है वहां
वैज्ञानिकों का मानना है कि चंद्रमा के एलक्यू 30 क्षेत्र में सर्वाधिक अंतरिक्ष पिंड टकराए हैं। इन टकराव से बने 46 क्रेटर 100 किलोमीटर से बड़े व्यास के हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार इस टकराव का असर चंद्रमा की सतह पर गहराई तक हुआ। इससे न केवल सतह पर मौजूद चीजों में उथलपुथल मची, बल्कि ये चीजें पिघलकर क्रेटरों में जमा भी होती गईं। वहीं टकराव के समय आसपास के क्रेटरों से निकले चंद्र के भूगर्भीय तत्व भी इनमें हो सकते हैं। यह चंद्रमा, खुद हमारी पृथ्वी और सौरमंडल से जुड़े इतिहास को जानने के टाइम कैप्सूल जैसे हैं।
प्राथमिक लैंडिंग साइट और दोनों क्रेटर
पीएलएस 54 चंद्रमा के दक्षिण ध्रुव मौजूद ये मैनजिनस सी और सिम्पेलियस एन नाम के दो ‘इंपैक्ट क्रेटरों’ के बीच में हैं। ‘इंपैक्ट क्रेटर’ यानी किसी आकाशीय पिंड के चंद्रमा की सतह पर तेजी से टकराने से इनका जन्म हुआ। इसी वजह से यह सटीक वृत्ताकार हैं। इंपैक्ट क्रेटर आसपास की सतह से निचले स्तर पर होते हैं। ये दोनों सैटेलाइट क्रेटर की श्रेणी में आते हैं। वैज्ञानिक अनुमान है कि जिस पिंड के ग्रह की सतह पर टकराने से मुख्य क्रेटर बनता है, उसके छोटे टुकड़ों के टकराने से सैटेलाइट क्रेटर बनते हैं। चंद्रमा पर दूसरी तरह के क्रेटर भी हैं, जिन्हें ‘वॉलकैनिक-क्रेटर’ यानी ज्वालामुखी से जन्म गड्ढे कहा जाता है। इनका जन्म चंद्रमा की भीतर उथलपुथल की वजह से हुआ है।
- मैनजिनस-सी : मैनजिनस का नामकरण 16-17वीं शताब्दी के इतालवी अंतरिक्ष विज्ञानी कार्लो मनजीनी के नाम पर हुआ। मैनजिनस-सी इसका सैटेलाइट क्रेटर है और करीब 25 किमी व्यास का है।
- सिम्पेलियस-एन : यह सिम्पेलियस क्रेटर का सैटेलाइट क्रेटर है। सिम्पेलियस को 16वीं व 17वीं शताब्दी के स्कॉटिश गणितज्ञ ह्यू सेम्पिल से अपना नाम मिला। सिम्पेलियस-सी आकार में मात्र 8 किमी व्यास का है।