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Parkash Singh Badal: प्रकाश सिंह बादल के निधन से पंजाब की सियासत पर कितना पड़ेगा असर? जानें सबकुछ

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु मिश्रा Updated Wed, 26 Apr 2023 12:19 PM IST

सार

प्रकाश सिंह बादल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी चंडीगढ़ पहुंचकर अंतिम श्रद्धांजलि दी। बादल पंजाब की सियासत के बड़े चेहरों में से एक थे। उनके निधन के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर पंजाब की सियासत पर इसका कितना असर पड़ेगा? क्या गठबंधन की राजनीति में कुछ बदलाव होगा? 
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प्रकाश सिंह बादल - फोटो : अमर उजाला
शिरोमणि अकाली दल के संरक्षक और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल का मंगलवार रात निधन हो गया। उन्होंने मोहाली के फोर्टिस अस्पताल में अंतिम सांस ली। केंद्र सरकार ने बादल के निधन पर दो दिन (26 और 27 अप्रैल) के राष्ट्रीय शोक की घोषणा की है। इस दौरान राष्ट्रीय ध्वज आधा झुका रहेगा और सरकारी मनोरंजन के कार्यक्रम नहीं होंगे। 

प्रकाश सिंह बादल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी चंडीगढ़ पहुंचकर अंतिम श्रद्धांजलि दी। बादल पंजाब की सियासत के बड़े चेहरों में से एक थे। उनके निधन के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर पंजाब की सियासत पर इसका कितना असर पड़ेगा? क्या गठबंधन की राजनीति में कुछ बदलाव होगा? 

 
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प्रकाश सिंह बादल - फोटो : अमर उजाला
शिरोमणि अकाली दल के संरक्षक और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल का मंगलवार रात निधन हो गया। उन्होंने मोहाली के फोर्टिस अस्पताल में अंतिम सांस ली। केंद्र सरकार ने बादल के निधन पर दो दिन (26 और 27 अप्रैल) के राष्ट्रीय शोक की घोषणा की है। इस दौरान राष्ट्रीय ध्वज आधा झुका रहेगा और सरकारी मनोरंजन के कार्यक्रम नहीं होंगे। 

प्रकाश सिंह बादल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी चंडीगढ़ पहुंचकर अंतिम श्रद्धांजलि दी। बादल पंजाब की सियासत के बड़े चेहरों में से एक थे। उनके निधन के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर पंजाब की सियासत पर इसका कितना असर पड़ेगा? क्या गठबंधन की राजनीति में कुछ बदलाव होगा? 
 

प्रकाश सिंह बादल। - फोटो : अमर उजाला
बादल के जाने से पंजाब की सियासत पर क्या पड़ेगा असर? 
इसे समझने के लिए हमने वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद कुमार सिंह से बात की। उन्होंने कहा, 'प्रकाश सिंह बादल ने पंजाब में सियासत की नई बयार लाई थी। एक बार अकाली दल की कमान संभाली तो उन्होंने पार्टी के भीतर किसी को सिर उठाने नहीं दिया।’

प्रमोद कहते हैं, ’शिअद छोड़कर अगर किसी ने अलग अकाली दल बनाया तो वह सफल नहीं हो पाया। कई नेताओं ने पार्टी छोड़कर अकाली दल का गठन करना चाहा लेकिन सफल नहीं हो पाए। उनकी राजनीतिक सूझबूझ का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने पंजाब में हिंदू-सिख भाईचारे की नई नींव रखी और तनाव भी खत्म कर दिया।'

प्रमोद आगे कहते हैं, 'बादल के चाहने वाले हर राजनीतिक दल में मिलेंगे। भाजपा से राजनीतिक गठबंधन टूटा लेकिन रिश्ते बरकरार रहे। अब अकाली दल में इसकी कमी जरूर खलेगी। सुखबीर सिंह बादल के हाथ में जब से पार्टी  की कमान आई है, तब से अकाली दल का परफॉरमेंस लगातार गिर रहा है।'

प्रमोद के अनुसार, 'अकाली दल के कमजोर होने का फायदा भाजपा को मिल सकता है। आने वाले दिनों में भाजपा इसे भुनाने की भी कोशिश कर सकती है। जैसे भाजपा ने यूपी में मुलायम सिंह यादव को एक विशेष पार्टी के छवि से बाहर निकालकर समाजवादी नेता के तौर पर पेश किया, उसी तरह प्रकाश सिंह बादल को भी पंजाब में भाईचारे के मिसाल की तौर पर पेश कर सकती है।'

 

पीएम मोदी ने प्रकाश सिंह बादल के साथ एक पुरानी फोटो साझा की। - फोटो : Social Media
अब प्रकाश सिंह बादल के बारे में जान लीजिए
प्रकाश सिंह बादल के निधन से पंजाब की राजनीति का एक बड़ा अध्याय खत्म हो गया है। 95 साल की उम्र तक सियासत में सक्रिय रहने के कारण उन्हें राजनीति का बाबा बोहड़ (दिग्गज) कहा जाता था। उन्होंने 20 साल की उम्र में 1947 में सरपंच का चुनाव जीतकर अपना राजनीतिक करियर शुरू किया था। इसके बाद वह पांच बार पंजाब के मुख्यमंत्री बने। 

खास बात यह है सबसे कम उम्र में पंजाब का सीएम बनने और सबसे अधिक उम्र में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने का रिकॉर्ड भी उनके नाम है। प्रकाश सिंह बादल 1970 में जब पहली बार मुख्यमंत्री बने तो 43 साल के बादल देश में सबसे कम उम्र यानी किसी राज्य के मुख्यमंत्री थे। 

2012 में जब वह पांचवीं बार मुख्यमंत्री बने तो वह देश के सबसे उम्रदराज मुख्यमंत्री बने और अब 2022 के चुनावी मैदान में उतरे तो सबसे ज्यादा उम्र के प्रत्याशी थे। बादल 10 बार विधानसभा तक पहुंचे। राजनीति के हर दांव पेच के माहिर प्रकाश सिंह बादल ने अपने जीवन के अधिकतर विधानसभा चुनाव मुक्तसर की लंबी सीट से लड़े। हालांकि, 2022 के आखिरी विधानसभा चुनाव में हार गए।

1957 में वह पहली बार पंजाब विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए। 1969 में प्रकाश सिंह बादल फिर से विधानसभा के लिए चुने गए और गुरनाम सिंह की सरकार में उन्हें सामुदायिक विकास, पंचायती राज, पशु पालन, डेरी और मत्स्य पालन मंत्रालय का कार्यभार दिया गया।  
 

प्रकाश सिंह बादल - फोटो : फाइल फोटो
हिंदू-सिख भाईचारे के प्रतीक
पंजाब के काले दौर में आतंकवादियों ने 20 हजार हिंदुओं और सिखों को मौत के घाट उतार दिया। साल 1984 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पंजाब का माहौल और बिगड़ गया। यह स्थिति 1995 तक बनी रही। 

1987 में आतंकवादियों ने हरियाणा में बस पर हमला करके 34 हिंदुओं और पंजाब में भी बस पर हमला करके 38 हिंदुओं की हत्या कर दी। हिंदू व सिखों के बीच गहरी खाई बनती जा रही थी। कई हिंदू पंजाब से पलायन करने लगे। ये हिंदू वो थे, जिन्होंने सिखों के साथ ही देश के विभाजन का दंश झेला था।

पंजाब में दो दशकों से अधिक समय तक उग्रवाद के बाद, अकाली दल ने 1997 के विधानसभा चुनावों में हिंदू-सिख भाईचारे के मुद्दे पर भाजपा के साथ हाथ मिला लिया और इसकी पहल प्रकाश सिंह बादल ने की थी। उन्होंने इसे नाखून व मांस का रिश्ता बताया। 

2011 की जनगणना के अनुसार राज्य में 57.69 फीसदी सिख, 38.49 फीसदी हिंदू, 1.93 फीसदी मुस्लिम और 1.26 फीसदी ईसाई आबादी थी।  
 

परिवार के साथ प्रकाश सिंह बादल की तस्वीर। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
1959 में हुआ था विवाह
प्रकाश सिंह बादल का जन्म 8 दिसंबर 1927 को पंजाब में मुक्तसर के एक गांव अबुल खुराना में हुआ था। पिता का नाम रघुराज और मां का नाम सुंदरी कौर था। 1959 में उन्होंने सुरिंदर कौर से शादी की। बेटी परनीत की शादी आदेश प्रताप सिंह कैरों से हुई, जो कि पूर्व सीएम प्रताप कैरों के बेटे हैं। बादल की पत्नी का 2011 में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया था, वह उनकी राजनीतिक सलाहकार व रीढ़ की हड्डी मानी जाती थी।
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