भय्यू महाराज उर्फ उदय सिंह देशमुख के अचानक निधन से महाराष्ट्र के राजनीतिज्ञों में भी शोक की लहर दौड़ पड़ी है। एक समय में उनका महाराष्ट्र की राजनीति में दबदबा था। महाराष्ट्र की राजनीति में जब भी बड़ा पेंच फसता था तो नेता उनसे मिलने इंदौर आश्रम दौड़े चले जाते थे। लेकिन, भय्यू महाराज पर्दे के पीछे रहकर काम करते थे। वहीं, यह भी कहा जाता है कि भय्यू महाराज मराठा क्रांति मोर्चे के सूत्रधारों में से एक थे।
भय्यू महाराज को राजनीतिक तौर पर ताकतवर संतों में गिना जाता था। महाराष्ट्र में विलासराव देशमुख के मुख्यमंत्री बनने के बाद भय्यू महाराज का राजनीतिक कद बढ़ा। विलासराव से लेकर सुशील कुमार शिंदे तक के मुख्यमंत्रित्व काल में उनका राजनीतिक दबदबा बना रहा। कहा जाता है कि उस समय महाराष्ट्र के नेता भय्यूजी के आशीर्वाद से ही विलासराव देशमुख और शिंदे के मंत्रिमंडल में शामिल हो सकते थे।
कई मौकों पर भय्यूजी ने कांग्रेस के अंदरूनी विवाद को भी सुलझाया है। उनका शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे और छत्रपति उदयन राजे भोसले से घनिष्ठ संबंध था। भय्यू महाराज दिवंगत शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के अंतिम संस्कार पर पूरे समय तक मौजूद थे। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, मनसे अध्यक्ष राज ठाकरे से भी भय्यू महाराज के करीबी संबंध थे।
हालांकि हाल के दिनों में भय्यू महाराज का राजनीतिक दबदबा काफी कम हो गया था। महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण की मांग को लेकर लाखों की संख्या में निकले मराठा क्रांति मोर्चे को उनका समर्थन था। इसके चलते भाजपानीत सरकार में उन्हें उतनी तवज्जो नहीं मिल पाई। यूपीए के कार्यकाल में महाराष्ट्र के राजनीतिक कनेक्शन की ही देन थी कि दिल्ली में लोकपाल के लिए अनशन पर बैठे समाजसेवी अन्ना हजारे का अनशन तुड़वाने में भी भय्यूजी ने मध्यस्थता की थी।
भय्यू महाराज ने महाराष्ट्र में सामाजिक क्षेत्र में भी कई कार्य किए हैं। विदर्भ और मराठवाड़ा में किसान आत्महत्या रोकने के लिए उन्होंने जनजागृति यात्रा निकाली थी। सद्गुरु धार्मिक ट्रस्ट के माध्यम से बुलढाणा में गरीब आदिवासी बच्चों के लिए आश्रमशाला का निर्माण कराया। कैदियों के बच्चों, वेश्याओं की शिक्षा के लिए भी उन्होंने सहयोग दिया था। अहमदाबाद के कोपर्डी बलात्कार पीड़ित बच्ची के लिए स्मारक बनवाकर मराठा समाज में अपनी पैठ और मजबूत की थी।