जब भी जम्मू-कश्मीर की बात की जाती है तो धारा 370 हमेशा बहस का मुद्दा रहती है, लेकिन अनुच्छेद 35ए कभी भी बहस की प्रमुख धारा का हिस्सा नहीं बन पाया जबकि जम्मू-कश्मीर में यह भी उतना ही महत्व रखता है। अनुच्छेद 35ए इसलिए भी चर्चा का विषय नहीं बन पाता क्योंकि लोगों को इसकी जानकारी ही नहीं है। यह अनुच्छेद जम्मू-कश्मीर विधानसभा को कई प्रकार के विशेष अधिकार तो प्रदान करता है, लेकिन किसी अन्य राज्य के नागरिकों, शरणार्थियों और वहां की आबादी के एक बड़े हिस्से के लिए भी यह एक बड़ी समस्या है। कहा जा सकता है कि अनुच्छेद 35ए जम्मू-कश्मीर को तो विशेष अधिकार देता है लेकिन एक बड़ी जनसंख्या के लिए मानवाधिकार खत्म कर देता है। यह अनुच्छेद ही इस बात का कारण है कि दशकों पहले यहां बसे शरणार्थियों को अब तक स्थायी नागरिक का दर्जा नहीं मिल पाया है।
सोमवार को सर्वोच्च न्यायालय करेगा सुनवाई
ऐसा नहीं है कि अनुच्छेद 35ए के खिलाफ या इसे खत्म करने के लिए कभी आवाज नहीं उठाई गई। इसकी संवैधनिकता पर सवाल उठाने वाली कई याचिकाएं सर्वोच्च न्यायालय में दायर की गई हैं। सर्वोच्च न्यायालय में सोमवार यानी 25 फरवरी को इसे लेकर सुनवाई होनी है। सुनवाई का एक प्रमुख कारण जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ (केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल) पर हुए आतंकी हमले को भी माना जा रहा है। इस हमले के बाद से राज्य में सुरक्षा व्यवस्था को और चाक-चौबंद किया गया है। सुनवाई की घोषणा के बाद से राज्य में पुलिस सक्रिय हो गई है और किसी प्रकार की अप्रिय घटना को टालने के लिए कुछ अलगाववादी नेताओं को हिरासत में भी लिया गया है।
जम्मू-कश्मीर के नेताओं का दावा, 35ए हटा तो गंभीर होंगे परिणाम
वहीं, जम्मू-कश्मीर के नेता हमेशा अनुच्छेद 35ए के समर्थन में रहे हैं फिर चाहे वह फारुख अब्दुल्ला हों या महबूबा मुफ्ती। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 35ए को न हटाए जाने और इसमें संशोधन न करने के पीछे तर्क दिया जाता है कि इससे जम्मू-कश्मीर में भारत का प्रभाव कम होगा और यहां अराजकता उस हद तक बढ़ जाएगी जिसे नियंत्रित करना बस के बाहर होगा। जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला ने अगस्त 2018 में कहा था कि वह मरते दम तक इसके लिए लड़ते रहेंगे, यदि इसके साथ छेड़छाड़ हुई तो हालात काफी हद तक बिगड़ जाएंगे। अब्दुल्ला ने कहा था कि इस मसले को जितना कुरेदेंगे उतना ही खून बहेगा।
वहीं, जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने जुलाई 2017 में इस मसले पर कहा था कि आर्टिकल 35ए में छेड़छाड़ की गई तो कश्मीर में ऐसा कोई नहीं बचेगा जो तिरंगे को पकड़ सके। महबूबा ने यह भी कहा कि एक तरफ हम संविधान के दायरे में कश्मीर मुद्दे का समाधान करने की बात करते हैं और दूसरी तरफ हम इस पर हमला करते हैं। इस तरह से कश्मीर मुद्दे का समाधान नहीं निकाला जा सकता।