सेंटिनल जनजाती, लोगों का शिकार करने वाला एक ऐसा समुदाय है जो करीब 60 हजार सालों से बाहरी दुनिया से अलग थलग रह रहा है। हाल ही में एडवेंचर ट्रिप अंडमान-निकोबार द्वीप समूह घूमने आए अमेरिकी नागरिक जॉन एलन चाऊ की भी सेंटिनल जनजाती के लोगों ने ही हत्या की है। मामले में तेजी दिखाते हुए पुलिस ने चाऊ की हत्या के आरोप में सात लागों को गिरफ्तार किया है। लेकिन क्या आप इस जनजाति के बारे में जानते हैं? आज हम आपको इसी जनजाति के बारे में बताने जा रहे हैं-
उत्तरी सेंटिनल द्वीप इस समुदाय के लोगों का घर है। यहां यह लोग किसी बाहरी को आने नहीं देते और अगर कोई बाहरी व्यक्ति यहां आ भी जाए तो इस जनजाति के लोग उसे तीर की सहायता से मार देते हैं। जैसे उन्होंने अवैध रूप से नाविक की सहायता से आए अमेरिकी को मारा। भारत की सबसे संरक्षित जनजाति में से एक इस जनजाति के रहन सहन के बारे में पिछले तीन दशकों से वैज्ञानिकों ने काफी अवलोकन किया है।
माना जाता है कि सेंटिनल जनजाति शुरुआत में अफ्रीका से आए लोगों के वंशज हैं। इनकी भाषा भी बाकी जनजातियों के मुकाबले समझ से बाहर है। यह जिस द्वीप पर रहते हैं वह पोर्ट ब्लेयर से 50 किमी पश्चिम में स्थित है। इनकी संख्या 150 से कम मानी जाती है।
अध्ययन से पता चलता है कि बीते 60 हजार सालों में इस जनजाति का कोई विकास नहीं हुआ है। आज भी ये लोग आदिम जीवन ही जी रहे हैं। यह लोग मछली और नारियल पर निर्भर रहते हैं।
इन लोगों को कोई भी बीमारी आसानी से लग सकती है। इन लोगों में रोगाणुओं से लड़ने की क्षमता भी नहीं होती क्योंकि ये बाहरी दुनिया से बिल्कुल कटे हुए हैं। यहां तक की अगर कोई पर्यटक सामान्य फ्लू वाले वायरस के साथ यहां आ जाए तो उससे ये पूरी जनजाति समाप्त हो सकती है।
साल 1960 के बाद से इस जनजाति तक पहुंचने के कई प्रयास किए गए लेकिन सब असफल रहे। यह लोग कई बार आक्रमण करते हुए उग्रता के साथ दर्शा चुके हैं कि इन्हें दुनिया से अलग ही रहना है।
माना जाता है कि सेंटिनल जनजति के साथ मित्रवत संपर्क स्थापित करने में सफल होने वाले एकमात्र व्यक्ति 1991 में भारतीय मानव विज्ञानी त्रिलोकनाथ पंडित थे।
साल 1981 में उत्तरी सेंटिनल द्वीप के आसपास कारगो नाव एमवी प्रिमरोज में सवार कुछ कर्मी आए थे। जिन्हें करीब एक हफ्ते बाद भारतीय हेलिकॉप्टर से रेस्क्यू किया गया। आज भी उस नाव का मलबा सैटेलाइट तस्वीरों में साफ दिखाई देता है।
साल 2006 में जनजाति ने दो नाविकों की हत्या कर दी थी। वह लोग गलती से द्वीप पर भटक गए थे। साल 2004 में हिंद महासागर में आई सुनामी के बाद इन लोगों ने किसी भी प्रकार की बाहरी सहायता को अस्वीकार कर दिया। जब सुनामी के दौरान इन्हें बचाने के लिए एक रेस्क्यू हेलिकॉप्टर आया तो इन्होंने उसपर भाले और तीर से हमला किया।
भारत सरकार ने कुछ सख्त कानून भी बनाए हैं, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि जनजाति दुनिया से अलग रहे। इन कानूनों के तहत कोई भी इन अलग थलग पड़े आदिवासियों से संपर्क नहीं साध सकता।
पीटीआई न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक भारत सरकार ने इस साल एक बड़ा कदम उठाते हुए इस द्वीप और केंद्र शासित प्रदेश के 28 अन्य इलाकों को प्रतिबंधित क्षेत्र परमिट और रैप रिजाइम को 31 दिसंबर, 2022 तक के लिए बाहर कर दिया था। रैप को हटाने का मतलब है कि कोई भी विदेशी नागरिक बिना सरकार की मंजूरी लिए इस द्वीप पर जा सकता है।