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मिलिए उस पुजारी से जो करता है रामलला की सेवा, तनख्वाह है 8 हजार

Wed, 06 Dec 2017 03:35 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
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- फोटो : times of india
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बाबरी विध्वंस की 25वीं बरसी पर अयोध्या में राम मंदिर का मुद्दा पूरे देश में गर्माया हुआ है। चर्चा के केंद्र में मंदिर और मस्जिद दोनों हैं, हालांकि विवादित जमीन पर किसका क्या हक होगा ये तय करने का जिम्मा अब सुप्रीम कोर्ट पर आ गया है।
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सुप्रीम कोर्ट में चल रहे विवाद में तीन पक्षकार प्रमुख हैं, जिनमें निर्मोही अखाड़ा, सुन्नी वक्फ बोर्ड और खुद रामलला। जिन्हें रामलला विराजमान के नाम से भी जाना जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि विवादित स्‍थल पर रामलला की देखभाल का जिम्मा कौन संभालते हैं? 

टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार, ये जिम्मेदारी है पुजारी सत्येंद्र दास के पास जो अपने एक सहयोगी के साथ गर्भ गृह में विराजमान भगवान राम की सेवा में दिनरात कार्यरत रहते हैं। गर्भगृह ही वह जगह जहां हिंदू मान्यताओं के अनुसार माना जाता है कि यहां भगवान राम का जन्म हुआ था। 
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सत्येंद्र दास बताते हैं कि यह एक विशेषाधिकार है जिसका मैं और मेरे सहयोगी पुजारी पूरा आनंद उठाते हैं, यह कार्य भगवान के आशीर्वाद के कारण मेरी किस्मत में था इसलिए मुझे इसके सिवाय कोई और ज्यादा इच्छाएं भी नहीं हैं। 
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रामलला को नहलाने, खिलाने की जिम्मेदारी सत्येंद्र दास की

अस्सी साल के सत्येन्द्र दास अयोध्या के अकेले पुजारी हैं जिन्हें एक मार्च 1992 से शिशु के रूप में भगवान राम को नहलाने, भोजन कराने और वस्‍त्र बदलने की जिम्मेदारी मिली हुई है। इस जिम्मेदारी को वह अनवरत निभाते चले आ रहे हैं। संस्कृत के शोधार्थी रहे सत्येन्द्र दास सुबह उठते ही "राम मूला, तारक और गायत्री मंत्र" का जाप शुरू कर देते हैं और दिनभर उनकी जुबान पर यही मंत्र रहते हैं। 

विवादित स्‍थल से कुछ दूर ही एक संकरी गली में रहने वाले सत्येंद्र दास अपना अधिकतम समय रामलला के निकट ही गुजारते हैं। हिंदूओं की भावनाओं से जुड़े इस स्‍थल पर रोजाना दस हजार से ज्यादा लोग दर्शनों के लिए आते हैं। 

सत्येंद्र दास को सरकार की ओर से यहां नियुक्त किया गया है, जिसके हर माह उन्हें 8,480 रुपये की तनख्वाह दी जाती है। उनकी इस तनख्वाह में हर साल 150 रुपये प्रतिमाह के हिसाब से वृद्िध होती है। 

सत्येंद्र दास बताते हैं कि वह साल 1958 में संत कबीर नगर से शिक्षा के लिए अयोध्या आए थे। वो कहते हैं कि शुरूआत में मैंने संस्कृत व्याकरण, वेदांत और फिर व्याकरण में आचार्य बनने की शिक्षा ली। फिलहाल मंदिर की सेवा ही मेरी एकमात्र संपत्ति है। दास कहते हैं कि इस कार्य के लिए मैं गर्व से खामोशी के साथ अपना जीवन भी त्याग सकता हूं। 
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