कर्नाटक की 224 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा के 104 विधायक हैं। कांग्रेस पार्टी के 79 विधायकों ने 2018 में जीत दर्ज की थी। 37 विधायक जनता दल(सेक्युलर) के हैं। एक विधायक आर शिवशंकर निर्दल हैं और एक विधायक बसपा का तथा एक केपीजेपी का है। इस तरह से राज्य सरकार को समर्थन देने वाले कुल विधायकों की संख्या 116 थी, जबकि सरकार को सत्ता में बने रहने के लिए 113 विधायकों की जरूरत है।
क्या है स्थिति?
कांग्रेस पार्टी के पांच विधायक नदारद बताए जा रहे हैं। एच नागेश और विधायक आर शिवशंकर ने राज्य सरकार से समर्थन वापस लेने की घोषणा कर दी है। वहीं भाजपा को राज्य में सरकार बनाने के लिए नौ विधायकों की जरूरत पड़ेगी। कांग्रेस और जद(एस) के विधायकों को छोड़ दें तो बसपा समेत दो निर्दल भी राज्य में सरकार बनवाने के लिए पर्याप्त नहीं है। ऐसे में यदि कांग्रेस पार्टी या जद(एस)के विधायक पार्टी का साथ छोडऩा चाहते हैं तो यह संख्या पार्टी के विधायकों की कुल संख्या की दो तिहाई होनी चाहिए। अन्यथा पार्टी का साथ छोडऩे वाले विधायकों की सदस्यता रद्द हो सकती है।
क्या कर्नाटक दोहराएगा उत्तराखंड का प्रयोग?
बड़ा सवाल है, क्या कर्नाटक में उत्तराखंड का प्रयोग दोहराया जाएगा। उत्तराखंड में हरीश रावत मुख्यमंत्री थे और कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने बगावत कर दी थी। बागी विधायक भाजपा के पाले में आ गए थे और मुख्यमंत्री हरीश रावत की सरकार पर संकट के बादल मंडराने लगे थे। उन्हें सत्ता में लौटने के लिए अदालत का सहारा लेना पड़ा। माना जा रहा है कि यदि कर्नाटक में राज्य सरकार गिरी और नई सरकार बनाने की पहल हुई तो उत्तराखंड का एपीसोड दोहराया जा सकता है।