अपने परिवार या कहें कि खानदान से विदेश जाने वाली वह पहली शख्स हैं। वह इसी साल फरवरी में पहली बार अमरीका गयीं थीं। मधुमिता के पहले विदेश दौरे के को याद करते हुए उनके पिता सुरेंद्र कहते हैं, "कई दूसरे घरों की तरह हमारे यहां भी किसी अपने का विदेश जाना बड़ी उपलब्धि थी। वो गईं तो सबको लगा कि चलो कोई तो विदेश घूम कर आया।"
लेकिन अब उन्हें इस बात का एहसास है कि उनकी बेटी को हजारों मील दूर लगातार अकेली रहना होगा। वैसे इस मुकाम को हासिल करने में मधुमिता की महेनत और लगन के साथ जिस एक व्यक्ति की अहम भूमिका रही है वो हैं भारत के पूर्व राष्ट्रपति और मशहूर वैज्ञनिक एपीजे अब्दुल कलाम।
सोनपुर में रेलवे सुरक्षा बल में सहायक सुरक्षा आयुक्त पद पर तैनात मधुमिता के पिता कुमार सुरेंद्र शर्मा बताते हैं, "मरहूम राष्ट्रपति ऐपीजे अब्दुल कलाम मधुमिता के सबसे बड़े प्रेरणा स्रोत हैं। उनकी किताबें और बायोग्राफी वह हमेशा पढ़ती रहती है। उन्हीं के विचारों से मधुमिता ने प्रेरणा ली है।"
स्कूल की पढ़ाई के दिनों में मधुमिता को मैथ और फिजिक्स और भौतिकी ज्यादा पसंद था। साथ ही डिबेट कंपीटीशंस में भी वह बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेती थीं। शुरुआत में मधुमिता आईएएस बनना चाहती थीं। पर बाद में उन्होंने इंजीनियरिंग को अपना करियर बनाया। 2010 में उन्होंने बारहवीं की कक्षा की परीक्षा पास करने के साथ साथ इंजीनियरिंग में दाखिला भी ले लिया।
सुरेंद्र शर्मा बताते हैं, "मधुमिता को बारहवीं में करीब 86 फीसदी अंक मिले थे। देश के अच्छे कॉलेजों में दाखिले के हिसाब से इतने अंक औसत माने जाते हैं। ऐसे में उनकी सफलता इस बात को एक बार फिर ये साबित करती है कि बोर्ड में बहुत अच्छे नंबर नहीं आने से भी सफलता के रास्ते बंद नहीं हो जाते हैं।"
सुरेंद्र कुमार शर्मा खुद सोनपुर में रेलवे सुरक्षा बल में सहायक सुरक्षा आयुक्त के पद पर तैनात हैं।
मधुमिता का परिवार
सुरेंद्र शर्मा की बड़ी बेटी रश्मि कुमार अभी इंदौर के अरविंदो मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की पढाई कर रही हैं। वहीं, परिवार का सबसे छोटा लड़का हिमांशु शेखर, अभी बेंगलुरु के आरवी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से मैकनिकल इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष के छात्र हैं।
मधुमिता से पहले बिहार के ही वात्सल्य सिंह को माइक्रोसॉफ्ट की ओर से करीब एक करोड़ 20 लाख रुपये के सालाना पैकेज पर नौकरी मिली थी। करीब दो साल पहले वात्सल्य को जब यह ऑफर मिला था तब वह आईआईटी खड़गपुर में आखिरी वर्ष के छात्र थे। वे खगड़िया जिले के सन्हौली गांव के रहने वाले हैं।