नादिर शाह कोहिनूर को अपने साथ ले गया। 1747 में नादिर शाह के अपने ही लोगों ने उनकी हत्या कर दी। इसके बाद कोहिनूर नादिर शाह के पोते शाह रुख मिर्जा के कब्जे में आ गया। 14 साल के शाह रुख मिर्जा की नादिर शाह के बहादुर सेनापति अहमद अब्दाली ने काफी मदद की तो शाह रुख मिर्जा ने कोहिनूर को अहमद अब्दाली को ही सौंप दिया।
अहमद अब्दाली इस हीरे को लेकर अफगानिस्तान तक पहुंचा। इसके बाद यह हीरा अब्दाली के वंशजों के पास रहा। अब्दाली का वंशज शुजा शाह जब लाहौर पहुंचा तो कोहिनूर उसके पास था। पंजाब में सिख राजा महाराजा रणजीत सिंह का शासन था। जब महाराजा रणजीत सिंह को पता चला कि कोहिनूर शुजा के पास है, तो उन्होंने उसे हर तरह से मनाकर 1813 में कोहिनूर हासिल कर लिया।
रणजीत सिंह कोहिनूर हीरे को अपने ताज में पहनते थे। 1839 में उनकी मौत के बाद हीरा उनके बेटे दिलीप सिंह तक पहुंचा। 1849 में ब्रिटेन ने महाराजा को हराया। दिलीप सिंह ने लाहौर की संधि पर तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी के साथ हस्ताक्षर किए। इस संधि के मुताबिक कोहिनूर को इंग्लैंड की महारानी को सौंपना पड़ा।
कोहिनूर को लॉर्ड डलहौजी 1850 में लाहौर से मुंबई ले कर आए और वहां से छह अप्रैल, 1850 को मुंबई से इसे लंदन के लिए भेजा गया। तीन जुलाई, 1850 को इसे बकिंघम पैलेस में महारानी विक्टोरिया के सामने पेश किया गया। 38 दिनों में हीरों को शेप देने वाली सबसे मशूहर डच फर्म कोस्टर ने इसे नया अंदाज दिया। इसका वजन तब 108.93 कैरेट रह गया। यह रानी के ताज का हिस्सा बना। अब कोहिनूर का वजन 105.6 कैरेट है।
स्वतंत्रता हासिल करने के बाद 1953 में भारत ने कोहिनूर की वापसी की मांग की थी, जिसे इंग्लैंड ने अस्वीकार कर दिया था। 1976 में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने भी इसकी मांग की थी, जिसे ब्रिटेन ने खारिज कर दिया था।
कोहिनूर पर जानकारी के लिए कार्यकर्ता रोहित सभरवाल ने आरटीआई डाली थी। उन्होंने इसका जवाब प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) से मांगा था। आरटीआई में पूछा था कि आखिर किस आधार पर कोहिनूर ब्रिटेन को दिया गया। पीएमओ ने उनकी अपील भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को भेज दी।
आरटीआई एक्ट के मुताबिक, एक लोक प्राधिकरण जानकारी के लिए आरटीआई को दूसरे प्राधिकरण के पास ट्रांसफर कर सकता है। आरटीआई कार्यकर्ता रोहत सभरवाल के अनुसार उन्हें यह नहीं पता था कि कोहिनूर के बारे में अगर कोई जानकारी चाहिए तो वह कहां से मिलेगी, इसलिए उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) के पास अर्जी भेजी थी। वहां से संभवत: इसे एएसआई को भेज दिया गया। हालांकि इसके जवाब में एएसआई ने जो जानकारी दी है वह सरकार के पहले के रुख से अलग है।
सरकार के बयान के उलट है एएसआई का जवाब
2016 में भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि कोहिनूर हीरा न तो अंग्रेजों ने जबरदस्ती लिया था और न ही यह चोरी हुआ था। सरकार ने कहा था कि पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह के उत्तराधिकारी ने एंग्लो-सिख युद्ध के खर्च के बदले 'स्वैच्छिक मुआवजे' के रूप में अंग्रेजों को कोहिनूर भेंट किया था।
एएसआई ने बताया है कि 1849 में ‘लॉर्ड डलहौजी और लाहौर के महाराजा दिलीप सिंह के बीच एक संधि हुई थी। इसे ‘लाहौर संधि’ कहा जाता है। इसी संधि के तहत लाहौर के महाराजा ने महारानी विक्टोरिया को कोहिनूर हीरा समर्पित किया था।
एएसआई ने साफ किया है कि संधि के दौरान दलीप सिंह (जो कि उस वक्त सिर्फ नौ साल के थे) ने अपनी मर्जी से महारानी को हीरा भेंट नहीं किया था, बल्कि उनसे कोहिनूर जबरन लिया गया था। जबकि इससे पहले केंद्र सरकार ने ऐसे ही मामले में सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह के वंशजों ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को कोहिनूर उपहार में दिया था। उसे न तो जबरन छीना गया था और न ही चुराया गया था।
कोहिनूर हीरा ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया के ताज में लगा दिया गया था। महारानी के ताज में लगे कोहिनूर हीरा इस समय करीब 106 कैरेट का है, जब इसकी खोज हुई थी तो इसका वजन करीब 700 कैरेट के आसपास था। भारत, ब्रिटिश सरकार से कई बार कोहिनूर लौटाने का अनुरोध कर चुका है। हालांकि, 2013 में ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री डेविड कैमरून ने इस मांग को खारिज कर दिया था।