योगेंद्र यादव और दर्शनपाल जैसे किसान नेताओं ने दूसरे संगठनों पर यह दबाव बनाया कि वे पुलिस द्वारा बनाए गए रुट का पालन करें। पंजाब के दूसरे संगठनों की बात करें, तो उन्हें दिल्ली पुलिस का यह रूट प्लान मंजूर नहीं था। उनका तर्क था कि सरकार ने उन्हें 62 दिन तक दिल्ली के बाहर तक बैठाए रखा है, ऐसे में अब केवल पांच हजार ट्रैक्टरों को दिल्ली में प्रवेश की इजाजत देना तर्कसंगत नहीं है। अगर इतने ही ट्रैक्टरों को मार्च की इजाजत देनी थी, तो लाखों किसानों और ट्रैक्टरों को दिल्ली क्यों बुलाया गया। इस बाबत जो बैठक हुई, उसमें किसान संगठनों के बीच असहमति दिखी। मंगलवार को जो कुछ हुआ, वह बहुत हद तक उसी असहमति और असंतोष का नतीजा था।पुलिस ने जो रुट तय किए थे, उन पर पांच हजार ट्रैक्टर चलने थे, लेकिन सभी संगठनों के नेता लाखों ट्रैक्टर लेकर उन रुटों पर उतर गए।किसी ने भी पांच हजार ट्रैक्टरों के नियम की परवाह नहीं की।
संयुक्त किसान मोर्चा के नेताओं का कहना है कि ट्रैक्टर परेड में शांति की अपील की गई है। कुछ लोग किसान के वेश में माहौल बिगाड़ना चाहते हैं। बाकी लाखों किसान शांतिपूर्वक तरीके से मार्च निकाल रहे हैं। राकेश टिकैत ने लालकिले की हरकत पर कहा, ये कुछ ऐसे लोगों की शरारत है, जो किसी पार्टी विशेष से जुड़े हैं।
सरदार जगमोहन सिंह का कहना था कि लालकिले तक जाना या रुट तोड़ना, ऐसी कोई बात किसी संगठन की तरफ से नहीं कही गई। सभी से पुलिस के रुट पर चलने की अपील की गई थी। पंजाब के एक दूसरे नेता का कहना था कि लालकिले तक पहुंचकर किसानों ने अपना गुस्सा जाहिर किया है।पिछले दो माह से किसानों को सड़क पर बैठा रखा है, उन्होंने यही गुस्सा निकाला है।उनका मकसद, देश की धरोहर का अपमान करना नहीं था।आईटीओ और लालकिले पर जो कुछ हुआ, उस दौरान कोई भी प्रमुख नेता नहीं था, इस बाबत किसान नेताओं का कहना था कि सभी की ड्यूटी अलग-अलग मार्गों पर लगाई गई थी।