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किसान आंदोलन: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दायर किया हलफनामा, 'दो दशक से राज्यों के साथ बातचीत के बाद आया कानून'

Tue, 12 Jan 2021 05:14 AM IST
देव कश्यप अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
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सर्वोच्च न्यायालय - फोटो : पीटीआई
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किसानों से गतिरोध दूर करने मे नाकाम रहने पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट से मिली फटकार के करीब घंटों के बाद केंद्र सरकार ने हलफनामा दाखिल कर कहा, कृषि कानूनों को जल्दबाजी में नहीं लाया गया है बल्कि यह दो दशक तक चली कवायद का नतीजा है।

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45 पेज के हलफनामे में केंद्र सरकार ने कहा, सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान यह संदेश गया कि सरकार ने जल्दबाजी में यह कानून पारित किया और सरकार ने पर्याप्त सलाह मशविरा नहीं किया। सरकार ने कहा, सच्चाई यह है कि दो दशक से केंद्र सरकार सक्रिय रूप से राज्यों के साथ इस मसले को लेकर बातचीत कर रही थी। किसानों को अपनी उपज का बेहतर दाम मिल सके और इसके लिए अवरोध से मुक्त बाजार उपलब्ध कराने की कवायद चल रही थी। लेकिन इसे लेकर राज्य अधिक दिलचस्पी नहीं ले रहे थे या आंशिक रूप से इसके प्रति गंभीरता दिखा रहे थे।


कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की ओर से दायर हलफनामे में कहा गया है कि देश के किसान इन तीनों कानूनों से खुश है क्योंकि उन्हें एक और विकल्प मिल गया है। पूर्व में फसलों की बिक्री की व्यवस्था अब भी बनी हुई है। इन तीनों कानूनों के जरिये किसानों के किसी अधिकार को छीना नहीं गया है। हमने आंदोलनकारी किसानों के साथ विवाद निपटाने की हर संभव कोशिश की है।
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कुछ स्वार्थी तत्वों ने फैलाईं गलतफहमी
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के सचिव संजय अग्रवाल की ओर से दिए गए हलफनामे में कहा गया है कि हम उस गलत धारणा को दूर करने की कोशिश कर रहे हैं, जिसमें कहा गया है कि संसद ने कानून पारित करने से पहले परामर्श प्रक्रिया को नहीं अपनाया था। ये धारणाएं प्रदर्शन स्थलों पर मौजूद गैर किसान तत्वों ने फैलाई हैं। कुछ किसानों और उनके यूनियनों ने चंद निहित स्वार्थी लोगों द्वारा बनाई गई आशंकाओं, गलतफहमियों और गलत धारणाओं के आधार पर किसानों के अनुकूल नए बनाए गए कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन किया है, जो पंजाब से दिल्ली और उसके  आसपास आ गए हैं।

दोनों पक्षों की सहमति के बाद ही 15 को वार्ता की तारीख तय
सरकार ने कहा कि किसानों से कई दौर की बातचीत हो चुकी है, लेकिन किसान कृषि कानूनों पर बातचीत करने के लिए तैयार नहीं है। वे सिर्फ कानूनों को रद्द करने की मांग कर रहे हैं। व्यापक हित को नजरअंदाज कर  किसान, कानून की मेरिट पर बातचीत करने को तैयार नहीं है। हालांकि दोनों पक्षों की सहमति के बाद ही 15 जनवरी को बातचीत की अगली तारीख तय की गई है।

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