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विलुप्त हो रहे रेत पर पांव के निशान से लोगों का पता लगाने वाले ‘खोजी’

Wed, 25 Dec 2019 07:40 PM IST
Mohit Mudgal न्यूज डेस्क, अमर उजाला,बावलियांवाला

सार

  • राजस्थान में भारत-पाक सीमा पर बाड़ और सख्त निगरानी बड़ा कारण
  • पहले बीएसएफ के पास थे सैकड़ों खोजी, अब केवल 25 ही बचे
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विस्तार
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भारत-पाकिस्तान सीमा पर रेगिस्तान में पांवों के निशान देखकर लोगों का पता लगाने में माहिर ‘खोजी’  विलुप्त होते जा रहे हैं। इसका बड़ा कारण सीमा पर तार की बाड़ लगने और बेहद सख्त सुरक्षा है। बीएसएफ के शीर्ष अधिकारी के मुताबिक, ‘खोजी’ इंसान ही होते हैं, जो रेत पर पड़े पांव के निशान से लोगों का पता लगाने में प्रशिक्षित होते हैं। वे किसी व्यक्ति के चलने के ढंग से उनकी पहचान करने में निपुण होते हैं।

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 जैसलमेर की बावलियांवाला चौकी के अधिकारी ने बताया, बीएसएफ के पास पहले सैकड़ों खोजी होते थे। ये पाकिस्तान से साथ लगने वाली 471 किलोमीटर की सीमा पर सुबह की पहली किरण के साथ गश्त करते थे। यह काफी थका देने वाला काम होता है। इसमें उच्च स्तर की बुद्धिमत्ता, व्यक्ति के वजन का आंकलन करने की क्षमता और रेत में छोड़े गए पांव के निशान से उनकी पहचान करने की काबिलियत की आवश्यकता होती है। अब बीएसएफ के पास केवल 25 खोजी ही रह गए हैं।

राजस्थान में अंतरराष्ट्रीय सीमा पर तार लगने, फ्लड लाइट और 24 घंटे होने वाली निगरानी के चलते सीमा पार से अवैध आवाजाही जीरो रह गई है। उन्होंने बताया कि सीमा पार कर क्षेत्र में आना अब काफी मुश्किल है। अगर कोई आ भी जाता है तो सुबह की गश्त के दौरान खोजी पैरों के निशान से पीछा करते हैं और उस व्यक्ति को पकड़ लिया जाता है।
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पांव के निशान की गहराई से लगाते हैं पता

बीएसएफ के पास बचे खोजियों में से एक नसीब सिंह ने कहा, वह रोजाना सुबह पैदल गश्त करते हैं। प्रत्येक सैनिक हर ढाई घंटे में 10 किलोमीटर की दूरी तय करता है। हर किसी के चलने का तरीका अलग होता है। उनके पैरों के निशान की गहराई और जमीन पर कौन कैसे पैर रखता है, इससे व्यक्ति का पता लगता है। नसीब सिंह 1988 में बीएसएफ में शामिल हुए थे।

अब बच्चों को दूसरे पेशे में भेजने को मजबूर

बीएसएफ अधिकारी के मुताबिक, ‘खोजी’ कई पीढ़ियों से अपना यह हुनर अपने बच्चों को देते है, लेकिन अब कम जरूरत के चलते वे बच्चों को दूसरे पेशे में भेज रहे हैं। इसके कारण अब उनकी संख्या बेहद कम रह गई है।

घटा सीमा पार अपराध

अधिकारी ने बताया कि जैसलमेर सेक्टर में पहले सीमा पार से ड्रग्स और सोने की तस्करी काफी होती थी। 1990 के मध्य में यहां कटीले तारों की बाड़ लगने से अब सीमा पार से होने वाला अपराध न के बराबर रह गया है। हालांकि संवेदनशील इलाका होने के कारण यहां कड़ी निगरानी रखी जाती है। अतीत में देखें तो 1965 और 1971 में भारत-पाक युद्ध के दौरान जैसलमेर पर हमला किया गया था। 

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