देश 2019 की दहलीज पर है। राजनीतिक दलों के कार्यालयों पर गहमागहमी बढ़ रही है। टिकट किसे मिलेगी, नहीं मिलेगी, ये सब आगे की बातें हैं। फिलहाल तो नेताओं की ड्रेस ट्रेंड कर रही हैं। करीब-करीब सभी पार्टियों के दफ्तरों के बाहर परंपरागत राजनीतिक ड्रेस अर्थात खादी भेजने वाले बैठ गए हैं। युवा नेताओं को जींस पर खादी की शर्ट भा रही है तो पचास साल से कम आयु वाले नेताओं को खादी की शर्ट के साथ खादी की पैंट ठीक लगती है। इस बीच एक बड़ा बदलाव जरूर देखने को मिला है। वह है धोती-कुर्ता गायब होना। पार्टी दफ्तरों के बाहर बैठकर खादी बेचने वालों का कहना है कि अब सुबह से शाम हो जाती है, मगर धोती लेने वाला नेता नहीं दिखता। पायजामा भी ट्रेंड से बाहर हो रहा है।
राजनीतिक दलों के कार्यालयों के बाहर खादी का जादू, किस रूप में और कैसे-कैसे आगे बढ़ रहा है, जानियें..
कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा, जेडीयू और अन्य कई दूसरे राजनीतिक दलों के बाहर खादी बेचने वाले मिल जाएंगे। इसके अलावा संसद भवन, सांसदों के आवास यानी नॉर्थ अवेन्यू व साउथ अवेन्यू पर भी खादी के थान रखे देखे जा सकते हैं। तीन मूर्ति भवन के आसपास कोई न कोई खादी वाला मिल जाता है। एआईसीसी के दफ्तर पर तो दो-दो खादी वाले मिल जाएंगे। एक अन्दर तो दूसरा बाहर बैठता है। इनके अतिरिक्त युवा इकाई के दफ्तर के बाहर भी खादी मिल जाती है। अगर कहीं पर कोई रैली या जनसभा है तो ये लोग वहां भी पहुंच जाते हैं। रामलीला मैदान, जंतर-मंतर और तालकटोरा स्टेडियम के बाहर जब भी कोई राजनीतिक कार्यक्रम होता है तो खादी बेचने वहां मिल जाएंगे।
बिहार के मधुबनी जिले के लोग नए नेताओं को पहनाते हैं खादी..
रायसीना रोड पर यूथ कांग्रेस के दफ्तर के बाहर बैठे बिहार के मधुबनी जिले के गांव मकसूदा निवासी शमशाद अली का कहना है कि उनकी कई पीढ़ियां इसी कारोबार में हैं। पहले बुनकर थे और अब सड़क पर बैठकर खादी बेच रहे हैं। उनके पड़ोसी गांव पंडोल व दहीबत से भी कई परिवार दिल्ली आए हैं। ये लोग एक दिन में कभी पांच-छह हजार भी कमा लेते हैं तो कभी देर शाम तक बोनी को तरस जाते हैं। खादी की पैंट-शर्ट या कुर्ता-पायजामा, अच्छी क्वालिटी वाला 15 सौ रुपये में मिल जाता है। क्वालिटी अगर कमजोर है तो रेट भी कम हो जाते हैं। जैकेट साथ में लेते हैं तो वह भी हजार-बारह सौ में मिल जाती है।
युवा नेता जींस पर खादी की शर्ट पहनना पसंद करते हैं..
शमशाद अली बताते हैं कि युवा नेता जो हाल-फिलहाल पार्टी ज्वाइन करते हैं, वे खादी की सफेद शर्ट जींस पर पहनना पसंद करते हैं। पायजामा उनकी पसंद में नहीं होता। कुछ युवा ऐसे भी होते हैं जो सफेद रंग की शर्ट के साथ खादी की सफेद रंग की पैंट बनवा लेते हैं। पचास साल की आयु वाले नेता भी पायजामे की जगह खादी की पैंट को ही तव्वजो दे रहे हैं। धोती वाला तो कोई इक्का-दुक्का ही मिलता है। जो युवा पहली बार पार्टी दफ्तर में जाते हैं तो वे खादी वाले के पास जरूर आते हैं। कई बार जब किसी युवा नेता को कोई पद मिल जाता है तो वह और उसके समर्थक भी खादी की तरफ आकर्षित होते हैं। भाजपा दफ्तर के पास बैठे जावेद का कहना है कि उनकी कमाई बाहर वाले नेताओं या कार्यकर्ताओं से ज्यादा होती है। ऐसे नेता तो कई बार खादी का पूरा थान ही खरीद ले जाते हैं। दिल्ली वाले नेता तो मॉल या दुकान से खादी के वस्त्र ले लेते हैं।
कांग्रेस पार्टी वाले 80 फीसदी सफेद रंग की खादी लेते हैं तो भाजपा के कुछ नेता केसरिया रंग की खादी पसंद करते हैं..
कांग्रेस पार्टी के दफ्तर पर बैठे खादी विक्रेता का कहना है कि यहां आने वाले अधिकांश नेता और कार्यकर्ता सफेद रंग की खादी पसंद करते हैं। इसे प्रतिशत में बताएं तो करीब अस्सी फीसदी नेता सफेद रंग ही पहनते हैं। भाजपा दफ्तर के पास खादी बेचने वाले नौशाद का कहना है कि यहां पर सफेद रंग ही ज्यादा बिकता है। हालांकि केसरिया एवं दूसरा अन्य रंग भी लेने वाले आते हैं।
कब किस पार्टी का कहां पर क्या प्रोग्राम है, आईबी के अंदाज में यह जानकारी पहले ही जुटा लेते हैं..
दिल्ली की किस पार्टी की रैली या जनसभा है, वह कहां पर होनी है और कितने लोगों के आने की संभावना है, यह सब डाटा पहले ही जुटा लिया जाता है। ठीक उसी अंदाज में, जैसे आईबी वाले सूचनाएं जुटाते हैं। चूंकि ये लोग गेट के आसपास ही खादी के थान लेकर बैठ जाते हैं और वहां से हर स्तर का नेता, पदाधिकारी या कार्यकर्ता आता जाता है। उनसे ये लोग पार्टी का कार्यक्रम ले लेते हैं। इसके अलावा जो पुराने लोग हैं, वे दफ्तर में जाकर ये सूचनाएं ले आते हैं। किस रैली या जनसभा में कितनी भीड़ और कहां से अधिक लोग आएंगे, यह जानकारी भी ले ली जाती है। इसी आधार पर ये लोग तय करते हैं कि खादी के कितने थान और किस रंग के उठाने हैं।