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Khabron Ke Khiladi: कौन होगा दिल्ली का अगला सीएम? खबरों के खिलाड़ी ने बताई सरकार गठन में हो रही देरी की कहानी

Sat, 15 Feb 2025 09:00 PM IST
राहुल कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Khabron Ke Khiladi: दिल्ली के नए मुख्यमंत्री को लेकर अलग-अलग नाम चर्चा में हैं। इनकी मजबूती और कमजोरी की भी बात हर कोई कर रहा है। इस हफ्ते खबरों के खिलाड़ी में भी इस पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार समीर चौगांवकर, पूर्णिमा त्रिपाठी, अवधेश कुमार, राजकिशोर और अनुराग वर्मा मौजूद रहे। 
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खबरों के खिलाड़ी - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे आए एक हफ्ते हो चुके हैं। राजधानी में 48 सीट जीतकर सत्ता में वापसी करने वाली भाजपा अब तक मुख्यमंत्री का चुनाव नहीं कर सकी है। नई सरकार के गठन में हो रही देरी को विपक्ष मुद्दा बना रहा है। इसके साथ ही नए मुख्यमंत्री को लेकर अलग-अलग नाम चर्चा में हैं। इनकी मजबूती और कमजोरी की भी बात हर कोई कर रहा है। इस हफ्ते खबरों के खिलाड़ी में भी इस पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार समीर चौगांवकर, पूर्णिमा त्रिपाठी, अवधेश कुमार, राजकिशोर और अनुराग वर्मा मौजूद रहे। 

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अवधेश कुमार: दिल्ली के चुनाव नतीजे आठ फरवरी को आएंगे। अब अगर सरकार बनाने में देरी हो रही है तो सवाल तो उठेंगे ही, लेकिन अगर आप देखेंगे तो लंबे समय से यह रहा है कि जहां भी भाजपा सत्ता में वापसी करती है और जहां पहले से मुख्यमंत्री के उम्मीदवार नहीं थे, वहां एक समस्या रही है। भाजपा समय लेकर ही घोषणाएं करती रही है। यह कोई पहली बार नहीं हो रहा है और हर बार यह प्रश्न उठता है। भाजपा में समस्या होगी यह मैं नहीं मनता। ये जरूर है कि सामने जो चुनौतियां हैं उसे देखते हुए थोड़ा समय लिया जा रहा है। 

पूर्णिमा त्रिपाठी: भाजपा ने किसी का नाम आगे करके चुनाव नहीं लड़ा था। प्रचार के दौरान कोई ऐसा नाम दिख भी नहीं रहा था। इसलिए मंथन चल रहा होगा, इसमें कोई शक नहीं है। दिल्ली में किसी भी मुख्यमंत्री के पास ज्यादा कुछ होता नहीं है। एमसीडी, पीडब्ल्यूडी, स्ट्रीट लाइट और  सफाई जैसे मुद्दे ही दिल्ली सरकार के पास होते हैं। इन मुद्दों के हिसाब से कौन ज्यादा उपयुक्त होगा, दिल्ली के स्थानीय मुद्दों के लिए जो चेहरा ज्यादा बेहतर हो मुझे लगता है कि वैसा चेहरा चुना जाएगा। 
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अनुराग वर्मा: 1993 में जब भाजपा की सरकार बनी थी तब जो सरकार रही थी। उसमें हैवीवेट चेहरों को मुख्यमंत्री बनाया गया था। एक के बाद एक तीन हैवीवेट मुख्यमंत्री बने। इन हैवीवेट्स की लड़ाई में दिल्ली का संगठन खत्म हो गया था। इस लर्निंग को देखते हुए मुझे नहीं लगता है कि भाजपा इस बार किसी हैवीवेट को मुख्यमंत्री बनाएगी। भाजपा की जीत की वजह उसकी खुद की वजहों से ज्यादा अरविंद केजरीवाल की नाकामियां रहीं हैं। अभी की परिस्थिति में भाजपा को एक ऐसा मुख्यमंत्री चाहिए, जो परफॉर्मर हो। 

राजकिशोर: भाजपा का जो काडर था वो कभी भी प्रभावित नहीं हुआ। वो 32 फीसदी से नीचे कभी नहीं गया। इस बार उसने उसे बढ़ाया है। अगर अमित शाह की चलती है तो प्रवेश वर्मा मुख्यमंत्री बनाए जा सकते हैं। इस वजह से नहीं कि वो जाट नेता हैं, बल्कि इस वजह से क्योंकि उन्होंने विपक्ष के सबसे बड़े चेहरे को हराया है। दिल्ली में अब मोदी की साख का मामला है। ऐसे में सड़क से लेकर यमुना तक सब पर नरेंद्र मोदी की प्रतिष्ठा दांव पर होगी। मुझे लगता है कि चेहरे को लेकर शीर्ष नेतृत्व को केवल इतना देखना है कि चेहरे पर कोई विवाद न हो। 

समीर चौगांवकर: मुझे लगता है कि 55 लोगों में से कोई भी मुख्यमंत्री बन सकता है। इनमें 48 विधायक हैं और सात सांसद हैं। भाजपा की ये खूबसूरती है कि उसका संगठन इतना अनुशासित और मजबूत है कि केंद्रीय नेतृत्व जिसे मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार करेगा, सब उसे स्वीकार कर लेंगे। प्रधानमंत्री का सोचने का तरीका इतना अलग है कि यह पता नहीं किया जा सकता है कि वो कब क्या निर्णय ले लेंगे। प्रवेश वर्मा की दावेदारी मुझे कमजोर लगती है। मोहन सिंह बिष्ट, सतीष उपाध्याय से लेकर भाजपा के टिकट पर जीतीं चारों महिलाएं भी बड़े दावेदारों में शामिल हैं। रेखा गुप्ता की संभावना भी काफी हैं। उन्हें भी खारिज नहीं किया जा सकता है। शिखा भी सीएम बन सकती हैं। उन्होंने सौरभ भारद्वाज को हराया है। इसी तरह सांसदों में भी कमलजीत सहरावत, मनोज तिवारी से लेकर बांसुरी स्वराज तक भी खुद को दावेदारों में गिन रहे हैं

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