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Khabron Ke Khiladi: महाकुंभ पर बयानबाजी करके कौन कैसे साध रहा अपनी सियासत? बता रहे हैं खबरों के खिलाड़ी

Sat, 22 Feb 2025 05:01 PM IST
अभिषेक दीक्षित न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

बीते हफ्ते ममता बनर्जी द्वारा कुंभ को लेकर दिए गए बयान पर जमकर सियासय हुई। इस बार खबरों के खिलाड़ी में इसी पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, विनोद अग्निहोत्री, समीर चौगांवकर, पूर्णिमा त्रिपाठी, अवधेश कुमार और राकेश शुक्ल मौजूद रहे। 
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महाकुंभ पर बयानबाजी - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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प्रयागराज में चल रहा महाकुंभ अपने अंतिम पड़ाव की ओर पहुंच चुका है। करीब डेढ़ महीने चले इस महाकुंभ में डुबकी लगाने वालों का आंकड़ा 58 करोड़ को पार कर चुका है। वहीं, महाकुंभ के दौरान हुए हादसों से लेकर गंगा के पानी तक पर सियासत भी हो रही है। बीते हफ्ते ममता बनर्जी द्वारा कुंभ को लेकर दिए गए बयान पर जमकर सियासय हुई। इस बार खबरों के खिलाड़ी में इसी पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, विनोद अग्निहोत्री, समीर चौगांवकर, पूर्णिमा त्रिपाठी, अवधेश कुमार और राकेश शुक्ल मौजूद रहे। 

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समीर चौगांवकर: ममता बनर्जी के बयान से मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ। क्योंकि उनकी जो राजनीति हो वो अपने मतदातों को संदेश देने के लिए इस तरह का बयान देंगी। लालू यादव ने अपने मतदाताओं को संदेश देने के लिए ही कह दिया कि कुंभ फालतू है। ममता बनर्जी की राजनीति बिल्कुल स्पष्ट है। बंगाल का मुस्लिम मतदाता उनके साथ खड़ा है। ममता ने अपनी राजनीति को देखते हुए ही इस तरह का बयान दिया है। अखिलेश यादव जरूर कुंभ में स्नान करने गए। क्योंकि उन्हें लगता है कि वो सिर्फ एमवाई समीकरण के भरोसे सत्ता में नहीं आ सकते हैं। 

विनोद अग्निहोत्री: कुंभ को सिसायत को औजार किसने बनाया इसे देखना होगा। कुंभ हर 12 साल पर होता है। हर सरकार इसे लेकर इंतजाम करती है। और हर कुंभ के बाद जो कुंभ आता है उसकी चुनौतियां बढ़ती हैं। इस बार कुंभ के आयोजन में जिस तरह से उसका प्रचार किया गया कि जो कुंभ नहीं जाएगा तो क्या हो जाएगा। 144 साल की बात हुई। ममता बनर्जी ने जो कहा वो उन्हें नहीं कहना चाहिए था। क्योंकि कुंभ आस्था का विषय है। कुंभ को लेकर दोनों पक्षों की ओर से सियासत हो रही है। 
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अवधेश कुमार: कुंभ में जो भगदड़ हुई उससे इनकार नहीं किया जा सकता है। वो एक दाग जैसा है। वहीं, जो दिल्ली में हुआ उसे सिर्फ कुंभ से जोड़ देना अतिवाद की निशानी है। क्योंकि उसमें हर यात्री कुंभ नहीं जा रहा था। यह रेलवे की घोर लापरवाही का परिणाम है। कुंभ के दृष्य को देखेंगे तो विचार का विषय है कि इतने कष्ट के बाद भी गांव-गांव शहर-शहर से हर तरह के लोग अगर निकलकर वहां डुबकी लगाना चाह रहा है तो यह देखना होगा कि वो कौन सा भाव है। 

राकेश शुक्ल: मृत्यु पर सवाल खड़े करना विपक्ष का हक बनता है और ये होना चाहिए। व्यवस्था पर सवाल खड़े करना विपक्ष का हक बनता है और ये होना चाहिए। लेकिन ये सवाल एकतरफा नहीं होना चाहिए। जहां तक बंगाल की तासीर की बात करें तो वो बाकी जगह से काफी अलग है। वहां का मुस्लिम अलग है। वहां का बंगाली खुद को हिंदू से ज्यादा बंगाली मानता है। इसलिए ममता का इस तरह का बयान दे रही हैं। ममता अपने बयान के जरिए अपने मतदाताओं को संदेश दे रही हैं। 

पूर्णिमा त्रिपाठी: कुंभ पर जो खींचतान हो रही है उसके पीछे सभी दलों की अपनी-अपनी राजनीति है। कुंभ पर ये राजनीति किसने शुरू की ये भी देखना होगा। कोई भी सरकार रही हो लोग कुंभ जाते हैं। सरकार प्रचार से लोगों को बुलाती है तो उसे व्यवस्था भी देनी होगी। ऐसा नहीं हो सकता है कि सिर्फ आप मेला क्षेत्र में व्यवस्था देकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते हैं। जहां तक मृत्युकुंभ वाले बयान की बात है तो ऐसा कहना कहीं से भी सही नहीं है। 

रामकृपाल सिंह: सिसायत करने वाले हर मुद्दे पर सियासत करेंगे। ये हमेशा से होता आया है। जहां तक कुंभ की बात है तो पूरे यूरोप और अमेरिका की आबादी को जोड़ लीजिए तो उतनी आबादी प्रयागराज में जाकर कुंभ में नहा चुकी है। यह हजारों-हजार लोगों की आस्था का सवाल है।  मेरा कहना है कि हादसा नहीं होना चाहिए था, लेकिन कुछ चीजे ऐसी है जिसे रोका नहीं जा सकता है। ममता बनर्जी ने जो कहा है कि वो एक हताशा है। उनका वोट बैंक खिसक न जाए इसलिए इस तरह का बयान दिया गया।

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