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खबरों के खिलाड़ी: संसद में फिर हंगामा जारी, विश्लेषकों ने बताया आखिर सदन में क्यों नहीं हो पा रही सार्थक चर्चा

Sat, 06 Dec 2025 09:17 PM IST
संध्या न्यूज डेस्क, अमर उजाला

सार

संसद का शीतकालीन सत्र में लगातार विपक्ष के हंगामें से एक दिन भी सत्र को सार्थक बहस नहीं हुई है। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है चलिए समझते हैं। 

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खबरों के खिलाड़ी - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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बीते सोमवार को संसद का शीतकालीन सत्र शुरू हुआ। एक बार फिर सत्र की शुरुआत हंगामे के साथ हुई। सदन में चर्चा की जगह सदन के बाहर ज्यादा हंगामा हो रहा है। एक सांसद द्वारा संसद परिसर में कुत्ता लेकर आना सबसे बड़ा मुद्दा बन गया। आखिर सदन में हो रहे इस हंगामे की वजह क्या है? इसी पर इस हफ्ते खबरों के खिलाड़ी में चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री, समीर चौगांवकर, राकेश शुक्ल, अजय सेतिया और अनुराग वर्मा मौजूद रहे। 

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अजय सेतिया: राहुल गांधी जिस तरह यह कह दिया कि अंदर सब वफादार बैठे हैं। इसका क्या मतलब था। क्योंकि बात तो कुत्ते की चल रही थी। आखिर उनका इशारा किस तरफ था। मुझे लगता है कि नेता प्रतिपक्ष को इस तरह की भाषा का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। रेणुका चौधरी ने जो काम किया उसके लिए वो माफी मांग सकती थीं। बात वहीं खत्म हो जाती, लेकिन वो बात को बढ़ाती चली गईं। संसद में आवारा कुत्तों को लाना संसद की गरिमा के अनुरूप नहीं था। ये राजनीति का मुद्दा बिलकुल नहीं है। 

राकेश शुक्ल: जो संसद जनता की समस्याओं को उठाने के लिए उस संसद में जनता के पैसों का नुकसान हो रहा है। जनता की समस्या की जगह हम किन चीजों पर चर्चा कर रहे हैं, ये सबसे बड़ा सोचने का विषय है। जो सांसद चुनकर आते हैं और उनको अपने क्षेत्र की समस्याओं को रखने का मौका भी नहीं उठा पा रहे हैं। कुछ चुनिंदा सांसद हंगामा करते हैं, बाकी बैठे रहते हैं। हम इसे उनकी सहमति मानकर चलते हैं, लेकिन उनकी पीड़ा को भी समझना होगा।

अनुराग वर्मा: प्रदूषण ऐसे नहीं हुआ कि संसद सत्र सोमवार को होना था और एक दिन पहले अचानक से बढ़ गया। ये कई वर्षों से है। उसके लिए संसद डिस्टर्ब करना कहीं से भी उचित नहीं है। अगर एक सांसद संसद भवन के अंदर ऐसा काम कर रहा है, जिससे ससंद सत्र में व्यवधान पड़ रहा है तो उसकी जांच होनी चाहिए। जनता को इसका सच पता होना चाहिए। 

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समीर चौगांवकर:
जो भी सत्ता पक्ष में आता है वो विपक्ष से अपेक्षा करता है कि वो सदन को चलने दे। जो आज सत्ता पक्ष में हैं उन्हें भी देखना चाहिए कि जब वो विपक्ष में थे तो उन्होंने क्या किया था। दोनों पक्षों में इनती कटुता आ चुकि है कि सदन सुचारू चलाना बहुत मुश्किल है। सत्ता पक्ष यह मानकर चलता है कि विपक्ष हमें सहयोग करेगा नहीं और विपक्ष यह मानकर चलता है कि सत्ता पक्ष हमारी सुनेगा नहीं। अब तो सदन का चलना लगभग नामुमकिन हो गया है। 

विनोद अग्निहोत्री: लोकतंत्र में यह सब अपरिहार्य है। दुनिया की हर संसद में इस तरह के हंगामे होते हैं। ये कोई नई बात नहीं है। मुझे इस सत्र में एक सकरात्मक चीज भी दिखाई दी। शुरुआती दो दिन के हंगामे के बाद दो बड़े मुद्दों वंदेमातरम और चुनाव सुधारों पर चर्चा के लिए दोनों पक्ष सहमत हो गए। सत्ता पक्ष और विपक्ष में जो विश्वास की कमी है वो इस हंगामे का बड़ा कारण है।

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