पूर्णिमा त्रिपाठी: इतने सीरियस आरोप लग रहे हैं। इन आरोपों पर चुनाव आयोग चुप्पी साधे हुए है। अगर राहुल गांधी झूठे आरोप लगा रहे हैं तो उनके ऊपर मुकदमा क्यों नहीं दर्ज हो रहा है? अगर उन आरोपों में कुछ सच्चाई हो तो इस पर सफाई देनी चाहिए। दोनों चीजें नहीं होना यह बताता है कि अंदरखाने कुछ बड़ी गड़बड़ है।
अवधेश कुमार: अगर आप चुनाव आयोग के विरुद्ध ही क्रांति करके आप चुनाव लड़ना चाहते हैं तो कोई कुछ नहीं कर सकता है। राहुल के बाद प्रियंका का जो भाषण है वो लोगों को उकसाने वाला है। दोनों ऐसा संदेश दे रहे हैं जैसे वो देश में उथलपुथल और अराजकता पैदा करना चाहते हैं।
रामकृपाल सिंह: मैं हमेशा कहता हूं कि निगेटिव नरेटिव काम नहीं करता है। हमेशा पॉजिटिव नरेटिव ज्यादा असर करता है। सवाल इस बात है कि अगर देश के साथ इतना बड़ा अत्याचार हुआ है तो राहुल खुद क्यों मुकदमा दायर नहीं कर रहे हैं। जब आप अदालत नहीं जाना चाहते हैं और आप सड़क पर लड़ना चाहते हैं तो दूसरा क्यों अदालत जाएगा।
अभिषेक कुमार: चुनाव आयोग की व्यवस्था संविधान से मिली है। पहले ये एक सदस्यीय आयोग था। बाद में इसे तीन सदस्यीय व्यवस्था बनी। मुख्य चुनाव आयुक्त को अभी भी संवैधानिक एम्युनिटी प्राप्त है, लेकिन बाकी दो चुनाव आयुक्तों की व्यवस्था सरकार के डिपार्टमेंटल सेक्रेटरी की तरह है। जब तक इसका इलाज नहीं निकलेगा तब तक इस पर सवाल रहेगा। ये सवाल राहुल गांधी पर भी है। दूसरा कोई भी संवैधानिक व्यवस्था अगर किसी पारदर्शिता का विरोध करेगी तो इसका मतलब है कि दाल में कुछ काला है।
विनोद अग्निहोत्री: राहुल गांधी ने जो आरोप लगाए उसमें जो प्रश्न है कि आखिर ब्राजीलियन मॉडल के फोटो 22 जगह कैसे आए? जिस महिला का नाम 200 बार है वो भी सवाल है? लोकतंत्र में सवाल उठाए जाने चाहिए, मैं हमेशा कहता हूं लोकतंत्र के लिए सवाल जरूरी हैं? इन सवालों का निराकरण करना संवैधानिक संस्थाओं को करना चाहिए।