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Khabron Ke Khiladi: मुख्तार की मौत पर नेताओं की बयानबाजी के क्या हैं सियासी मायने? जानें ‘खबरों के खिलाड़ी’ से

Sat, 30 Mar 2024 06:20 PM IST
अभिषेक दीक्षित न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

इस हफ्ते के खबरों के खिलाड़ी में मुख्तार की मौत पर हो रही सियासत पर ही चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, राहुल महाजन, समीर चौगांवकर, पूर्णिमा त्रिपाठी और अनुराग वर्मा मौजूद रहे। 
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Khabron Ke Khiladi - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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उत्तर प्रदेश की मऊ विधानसभा सीट से पांच बार विधायक रहा सजायाफ्ता माफिया मुख्तार अंसारी शनिवार को सुपुर्दे खाक कर दिया गया। मुख्तार की गुरुवार को बांदा जेल में दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई थी। मुख्तार की मौत पर सियासत भी शुरू हो गई है। विपक्षी दल आरोप लगा रहे हैं कि यह स्वाभाविक मौत नहीं है। इस हफ्ते के खबरों के खिलाड़ी में मुख्तार की मौत पर हो रही सियासत पर ही चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, राहुल महाजन, समीर चौगांवकर, पूर्णिमा त्रिपाठी और अनुराग वर्मा मौजूद रहे। 

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पूर्णिमा त्रिपाठी: मुझे यह उचित नहीं लगता है कि किसी की मौत पर सियासत की जाए। विपक्षी दल एक समुदाय विशेष के वोट बैंक को साधने के लिए इस तरह की बातें कर रहे हैं। इसके बाद भी मेरा मानना है कि न्याय की प्रक्रिया का पालन होना चाहिए। पहले अतीक अहमद और अब मुख्तार अंसारी की मौत से कई तरह के सवाल जरूर खड़े करते हैं। 

जब किसी की मौत हुई हो तब धर्म की राजनीति करना बिल्कुल गलत है। लेकिन, यह दोनों तरफ होना चाहिए। एक तरफ राम रहीम को पैरोल पर पैरोल मिलती रहती है। जब कोई चुनाव आता है तब राम रहीम पैरोल पर होता है। वहीं, दूसरी तरफ आप पर जहर देने का आरोप लगते हैं। ये कहां तक उचित है।  
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रामकृपाल सिंह: न्याय होना ही काफी नहीं होता है। न्याय होते हुए दिखना भी जरूरी है। इस सरकार पर इस तरह से सवाल जरूर उठते हैं। अगर न्याय होते हुए नहीं दिखेगा तो दीर्घकालिक तौर पर इसके नुकसान हो सकते हैं। न्यायपालिका को अनदेखा करके किसी भी तरह का कदम गलत होता है। लोकप्रियता और अलोकप्रियता के सहारे क्या उचित है क्या अनुचित है यह नहीं तय होना चाहिए। 

अपराधी को अपराधी कहिए, वहां उसका धर्म और जाति नहीं लाना चाहिए। लेकिन, हमारे देश में आजादी के बाद से नेहरू के दौर को छोड़ दें तो एक अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति शुरू हुई। 80 फीसदी मतदाता हर ओर बंटता था। हर कोई यह कोशिश करता था बचे 20 फीसदी को साध लिया तो निर्णायक होगा। कल से जितने बयान आ रहे हैं वो उसी तुष्टिकरण के लिए आ रहे हैं। 

समीर चौगांवकर: जितने भी डॉन और माफिया रहे उन्हें राजनीति से संरक्षण मिलता रहा है। वोट और नोट की साठगांठ रही है। इस तरह के लोग निर्दलीय भी जीत जाते हैं। खुद मुख्तार दो बार निर्दलीय जीता था। मुख्तार की मौत के बाद से सोशल मीडिया पर दो तरह के बयानों की बाढ़ है। कई लोग उसे रॉबिनहुड बता रहे हैं तो कई लोग उसे आतंक का पर्याय भी बता रहे हैं। 2017 के बाद योगी आदित्यनाथ ने कानून-व्यवस्था को सुधारा है, जो छवि बनी है मुझे लगता है कि वह छवि प्रदेश के विकास के लिए जरूरी भी थी। 

अनुराग वर्मा: मुख्तार अंसारी हों या अतीक अहमद हों दोनों ही उत्तर प्रदेश में भय का पर्याय थे। दोनों ने कानून का दुरुपयोग किया था। अगर मुख्तार अंसारी को उत्तर प्रदेश में नहीं लाया गया होता तो जेल से उनकी सत्ता चल रही होती। मुख्तार पंजाब की जेल में सालों रहें लेकिन उनकी तबियत तब कभी खराब नहीं हुई। जब वो उत्तर प्रदेश आए तब उनकी तबियत खराब होनी शुरू हुई। क्योंकि, उत्तर प्रदेश आने के बाद ही वो असल में जेल में रहे। आप एक वर्ग विशेष का वोट लेने के लिए एक अपराधी को रॉबिनहुड बना रहे हैं।  

राहुल महाजन: उस वक्त साहिब सिंह और मकनू सिंह नाम के दो गैंगस्टर थे। मुख्तार ने उनका साथ लिया था। ये साथ क्यों लिया गया था यह भी देखना होगा। बहुत से लोग कृष्णानंद राय की मौत की बात करते हैं। लेकिन, यह भी देखना होगा कि लखनऊ में जब दोनों का आमना-सामना हुआ तब दोनों ओर से गोलीबारी हुई थी। जब आप इसके पीछे की राजनीति में जाएंगे तो बहुत से चेहरे सामने आएंगे। मुख्तार नि:सदेह एक अपराधी था। किसी भी व्यक्ति की लोगों में अलग-अलग छवि होती है। अगर हम राजनीति दलों की बात करें तो इन दलों को अपराधियों के दबदबे का फायदा होता है।

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