इस हफ्ते होली हर्षोउल्लास के साथ मनाई गई। रजमान के जुमे के दौरान आए इस त्योहार को लेकर नेताओं की बयानबाजी चर्चा में रही। संभल से बिहार तक हर ओर से भड़काऊ बयान सामने आए। बयानों की सियासत के बीच होली का त्योहार शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हो गया। होली और रमाजन को लेकर हुई इस बयानबाजी के पीछे क्या सियासत है। इसी पर इस हफ्ते के ‘खबरों के खिलाड़ी’ में चर्चा में हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, राकेश शुक्ल, अवधेश कुमार, राजकिशोर, अजय सेठिया, अनुराग वर्मा और समीर चौगांवकर मौजूद रहे।
रामकृपाल सिंह: यह ढकने की प्रक्रिया बहुत पहले से होती रही है। यह पहले भी होती रही थी। तब इसे सहज तरीके से लिया जाता था। ऐसा नहीं है कि पहली बार ऐसा हो रहा है। हम लोग बचपन से ही यह देखते आए हैं कि जब भी हिंदू और मुस्लिम समाज के अहम त्योहार एक साथ आते हैं तो थोड़ी सतर्कता बरती जाती थी, लेकिन पहले लोग इसे सहज रूप से लेते थे। आज की तारीख में आप वही बात कह दीजिए तो उसको बंटवारे के रूप में देखा जाता है और दोनों पक्षों की ओर से एक ताकत आजमाइश होती है। यह सच्चाई है और ये दुखद है। जिस तरह के भाषण दिए जा रहे हैं वो बहुत दुर्भाग्यपूर्ण हैं।
राकेश शुक्ल: उत्तर प्रदेश में 10-12 जिलों में इस तरह से मस्जिदों को ढंका गया। उत्तर प्रदेश में कम से कम दो दर्जन ऐसे क्षेत्र हैं जहां मुस्लिम आबादी अत्यधिक है। फिर इन्हीं 10-12 जिलों में ही क्यों बाकी जिलों को क्यों छोड़ दिया गया। यह मूल प्रश्न है। इस बार इसकी शुरुआत कहां से हुई। यह भी देखना होगा।
राजकिशोर: कार्पेट के नीचे अगर आप गंदगी को छिपाकर रखेंगे तो उसमें धीरे-धीरे सढ़ांध पैदा होगी। उसको सही समय पर संबोधित करना पड़ेगा। मुझे नहीं लगता है कि फराह खान ने जो बयान है, उसमें और नुपुर शर्मा के बयान में कोई फर्क है। फराह खान एक ऐसे त्योहार को जो आपके आराध्य से जुड़ा है, एक ऐसा त्योहार जिसमें समाज के सभी वर्ग एक दूसरे पर रंग उछालते हैं, उसे लेकर इस तरह के जो गैर जिम्मेदाराना बयान दिए हैं, मुझे नहीं पता यह संयोग है या प्रयोग। सोशल मीडिया पर जो असामाजिक तत्व पैदा हो गए हैं उन्हें देखने की जरूरत है।
अजय सेठिया: पिछले 20-25 साल से हम देख रहे हैं समाज में कट्टरता बढ़ रही है। समाज में जो समरसता जो पहले गलियों में मोहल्लों में होती थी उसमें अब राजनीति आ गई है। इन चीजों को समाज ही हल करेगा। इसे राजनीति हल नहीं कर सकती है। सूफी दरगाहों के अंदर वर्षों से होली मनाई जाती रही है। आजादी के बाद ऐसा लगता था कि अब सौहार्दपूर्ण वातावरण होगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पिछले कुछ समय में दंगे रुके हैं। यह प्रशासनिक दक्षता रजानीति में जरूर आई है।
अवधेश कुमार: एक शक्तिशाली ईकोसिस्टम इस देश और दुनिया में है जो पूरे नैरेटिव को बदल देता है। इस ईकोसिस्टम ने ऐसे नैरेटिव बनाए कि अनुज चौधरी को खलनायक बना दिया। किसी पर पत्थर और गोली चलेगी तो पुलिसवाले का क्या दायित्व होगा। देश में 122 करोड़ हिंदू हैं और 16 करोड़ मुसलमान है। दोनों को मिलजुलकर रहना होगा। अरब के इस्लाम में और भारत-पाकिस्तान और बांग्लादेश के इस्लाम में जमीन आसमान का अंतर है।
अनुराग वर्मा: लोकतंत्र में जो कुछ भी होता है वो चुनाव के इर्दगिर्द हो रहा होता है। अगर मैं संभल से शुरुआत करूं तो देखिए मस्जिदों को ढकने की परंपरा पुरानी है, कोई नई नहीं है। मस्जिदें सिर्फ संभल में ही नहीं ढकी गईं और जगह भी ढकी गईं। संभल में दंगों का एक इतिहास रहा है। संभल हिंदूओं के हिसाब से एक पवित्र जगह मानी गई है। दंगों के चलते यहां की डायनमिक्स में काफी बदलाव हुआ है।
समीर चौगांवकर: कहा जाता है कि अंत भला तो सब भला। जिस तरीके से प्रशासन ने वहां स्थितियों को संभाला और लोगों ने अपनी जिम्मेदारियों को समझा, लेकिन जिस तरीके से माहौल बना उसने माहौल को ज्यादा गर्म कर दिया। हर महीने कोई न कोई त्योहार आता है। मुझे लगता है कि आने वाले जितने भी त्योहार होंगे वो इसी तरह से अर्धसैनिक बलों और पुलिस सुरक्षा के बीच मनेंगे।