पूर्णिमा त्रिपाठी: नरेटिव दोनों तरफ से बन रहा है। अगर आपको लगता है कि भारत इस नरेटिव वार में कहीं पिछड़ गया तो उसकी केवल एक वजह है ट्रंप का ट्वीट करना। इस संघर्ष विराम में किसी तीसरे देश का कोई हाथ नहीं यह साफ करने में सरकार ने थोड़ी देर कर दी। इस देरी की वजह से ही नरेटिव गढ़ने का मौका मिल गया। प्रधानमंत्री ने आदमपुर एयरबेस पर जो भाषण दिया उसमें यह बिलकुल साफ कर दिया कि यह कोई सीजफायर नहीं है, ये सिर्फ अस्थायी है। अगर पाकिस्तान दोबार कुछ करेगा तो उसे उससे भी बड़ा जवाब दिया जाएगा। यही बयान अगर ट्रंप के ट्वीट के तुरंत बाद आ गया होता तो किसी को भी फॉल्स नरेटिव गढ़ने का मौका नहीं मिलता।
राकेश शुक्ल: ऑपरेशन सिंदूर अचानक क्यों धीमा पड़ा, इसका कोई तो बड़ा कारण रहा होगा। एक ऑपरेशन जो इतनी सफलता से चल रहा है उसे अगर आप अचानक रोक रहें तो कोई न कोई तो बड़ा कारण रहा होगा। जितनी भी चर्चाएं चल रही हैं वो घूम फिर कर न्यूक्लियर पर जाकर टिक जाती हैं। जहां तक तिरंगा यात्रा का सवाल है तो इसमें भारत सरकार जागरुता ला रही है या राजनीति लाभ ले रही वो एक अलग विषय हो जाएगा। उस पर अलग से चर्चा की जा सकती है।
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विनोद अग्निहोत्री: पहलगाम में जब घटना हुई तो पूरे देश में गुस्सा था। जनमानस चाहता था कि कोई कार्रवाई होनी चाहिए। विपक्ष भी सरकार पर सवाल खड़े कर रहा था। जब ऑपरेशन सिंदूर हुआ तो अचानक चीजें बदलीं। जब आप सरकार में होते हैं तो स्थितियां अलग होती हैं और जब आप विपक्ष होते हैं तो अलग होती हैं। किसी ट्रेड यूनियन के नेता को आप कंपनी का चेयरमैन बना दीजिए तो आधी से ज्यादा मांगे तो वो खुद ही छोड़ देगा। ये स्वभाविक है।
समीर चौगांवकर: भारत ये मानकर चल रहा था कि तमाम देश उसके साथ आएंगे। कूटनीतिक स्तर पर सरकार को जो उम्मीद थी उस तरह से दुनिया के देशों ने उसे समर्थन नहीं दिया। सरकार से इस मामले में थोड़ी सी चूक जरूर हुई है। इस ऑपरेशन को अचानक से रोकने पर सवाल जरूर हुए। मुझे लगता है कि आने वाले समय में यह साफ होगा कि भारत ने यह कदम अचानक से क्यों उठाया।