अमेरिका में 20 जनवरी को नई सरकार ने अपना काम शुरू कर दिया है। चार साल के अंतराल के बाद डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर सत्ता में लौट आए हैं। ट्रंप के एक बार फिर राष्ट्रपति बनने के बाद भारत के लिए किस तरह के बदलाव होंगे? दोनों देशों के संबंधों पर क्या असर पड़ेगा? शपथ लेते ही ट्रंप द्वारा लिए गए ताबड़तोड़ फैसलों से क्या संकेत मिलते हैं? इन्हीं सवालों पर इस हफ्ते ‘खबरों के खिलाड़ी’ में चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री, पूर्णिमा त्रिपाठी, राजकिशोर, अजय सेठिया, बिलाल सब्जवारी और अनुराग वर्मा मौजूद रहे।
बिलाल सब्जवारी: जिस तरह से उन्होंने कनाडा, मैक्सिको जैसे देशों पर टैक्स लगाने की बात कही है, ब्रिक्स देशों पर भी उन्होंने निशाना साधा है। ट्रंप और नरेंद्र मोदी में कई समानताएं दिखती हैं। मोदी भारत को विश्व की आर्थिक शक्ति बनाना है तो ट्रंप कहते हैं कि अमेरिका को फिर से महाना बनाना है। ट्रंप गोल्डेन एरा की शुरुआत की बात करते हैं तो मोदी अमृतकाल की बात करते हैं। आने वाले वक्त में यह पता चलेगा कि दोनों के बीच का रिश्ता किस तरह आगे बढ़ता है।
अनुराग वर्मा: भारतीयों के साथ परेशानी यह है कि हम भारतीयता और भारतीयों को लेकर बहुत उत्साहित रहते हैं। कमला हैरिस के मामले में हम तो यहां तक पहुंच गए कि कमला हैरिस की पहली जिम्मेदारी भारतीयों के हित के लिए काम करना है, अमेरिका के लिए बाद में। अब हमने जेडी वेंस की पत्नी उषा के साथ इसी तरह की भावुकता से जोड़ दिया है। लेकिन सच्चाई यह है कि अमेरिका का नेता पहले अमेरिका के हित को देखेगा। अभी यह कहना बहुत जल्दबाजी होगी कि अमेरिका की जो नीतियां हैं वो भारत के हित में हैं या नहीं।
राजकिशोर: सबसे पहले भारत की अमेरिका में क्या हैसियत है ये ट्रंप से शपथ ग्रहण में नजर आया था। बात रही व्यापार की तो हमने जो इंपोर्ट ड्यूटी ज्यादा लगा रखी है उसे लेकर अमेरिका को समस्या है। इसे लेकर दोनों देशों को समाधान निकलाना होगा। भारत की राजनीतिक और कूटनीतिक तौर पर अमेरिका में भूमिका है। ट्रंप शपथ लेने से पहले ट्रंप का असर दिखने लगा। जो नया वर्ल्ड ऑर्डर तैयार हो रहा है, उसमें भारत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
पूर्णिमा त्रिपाठी: ट्रंप एक व्यवसायी हैं, हमें यह नहीं भूलना चाहिए। ट्रंप अमेरिका फर्स्ट के नारे पर ही वापस आए हैं। तो वो उनकी प्राथमिकता में होगा। जहां तक भारत की बात है तो भारत दुनिया का एक बहुत बड़ा बाजार है। उस बाजार को कोई भी नजरअंदाज नहीं कर सकता है। एच1बी वीजा में ऐसा कुछ नहीं बदला है जिससे हमें चिंता करने की जरूरत है। भारत के लिए जितना अमेरिका जरूरी है उतना ही अमेरिका के लिए भारत भी जरूरी है।
अजय सेठिया: भारत की दृष्टि से अगर देखें तो फरवरी में होने वाली क्वाड बैठक बहुत अहम होगी। ये बैठक भारत में होनी है, जिसमें ट्रंप और मोदी की मुलाकात होगी। अमेरिका फर्स्ट की नीति के तहत तेल के मामले में एक संतुलन लाने की कोशिश होगी। जहां तक चीन की बात है तो अमेरिका चीन के मुकाबले भारत को प्रथमिकता देगा, इसमें कोई शक नहीं होना चाहिए।
विनोद अग्निहोत्री: विश्व राजनीति में यह होता रहता है। बड़ी शक्तियां तमाम देशों का इस्तेमाल करती रही हैं। भारत के मामले में ये कहा जा सकता है कि नेहरू से लेकर मोदी तक भारत के प्रधानमंत्रियों ने एक ऐसा रुख अपनाया, जिसमें उन्होंने अपने हितों को हमेशा ध्यान में रखकर बड़ी शक्तियों के साथ सामंजस्य बैठाया है। कोई भी राष्ट्राध्यक्ष अपने देश के हितों से समझौता नहीं करेगा। ये सही भी है। जहां तक ट्रंप की बात है तो उनके शुरुआती फैसलों से मिश्रित संकेत मिले हैं। इनसे दुनिया में तमाम तरह से परिवर्तन दिखाई देंगे।