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Khabron Ke Khiladi: कैसे चलेगी नई लोकसभा, क्या राहुल गांधी बनेंगे नेता प्रतिपक्ष? बता रहे हैं खबरों के खिलाड़ी

Sun, 23 Jun 2024 04:00 AM IST
अभिषेक दीक्षित न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

नई लोकसभा में बढ़ी हुई ताकत के साथ आए विपक्ष मुद्दों को कैसे उठाएगा? सरकार के सामने कौन सी चुनौतियां होंगी? सदन चालने के लिए सरकार किस तरह से विपक्ष को साधेगी? इन सभी सावलों पर इस हफ्ते के खबरों के खिलाड़ी में चर्चा हुई।
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संसद सत्र में सरकार के लिए सिरदर्द बनेंगे राहुल गांधी। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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लोकसभा चुनावों की प्रक्रिया पूरी होने के बाद नई सरकार का गठन हो चुका है। अब नई लोकसभा का पहला सत्र शुरू होने जा रहा है। नई लोकसभा में बढ़ी हुई ताकत के साथ आए विपक्ष मुद्दों को कैसे उठाएगा? सरकार के सामने कौन सी चुनौतियां होंगी? सदन चालने के लिए सरकार किस तरह से विपक्ष को साधेगी? इन सभी सावलों पर इस हफ्ते के खबरों के खिलाड़ी में चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, विनोद अग्निहोत्री, समीर चौगांवकर, अवधेश कुमार और राकेश शुक्ल मौजूद रहे। 

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अवधेश कुमार: नीट का सवाल विपक्ष को उठाना चाहिए। यह असाधारण स्थिति है। चाहे बिहार में हो या बंगाल में हो या कहीं भी हो, जो एजेंसी इस परीक्षा को आयोजित करती है उसकी यह जिम्मेदारी है। यह लाजमी है कि विपक्ष अगर इस मुद्दे  को नहीं उठाएगा तो फिर विपक्ष पर ही सवाल उठेंगे। पेपर लीक हो जाना एक समान्य बात नहीं है। बीते 10 साल के बाद पहली बार लोकसभा के अंदर अंकगणित बदला हुआ है। भाजपा एक विचारधारा की पार्टी है। इसलिए उसके साथ रहने वाले दल भी कई बार भाजपा के एजेंडे से जुड़े मद्दों पर साथ नहीं आते हैं। विपक्ष यह कोशिश कर रहा है कि ऐसा माहौल बनाना है कि यह सरकार हारी हुई है। राहुल गांधी विपक्ष के नेता का पद क्यों नहीं स्वीकार कर रहे हैं, यह भी बड़ा सवाल है। कम से कम कांग्रेस पार्टी बैठक करके अपने नेता को तो चुन सकती थी। कांग्रेस जिन कारणों से नकारी गई थी, उन कारणों से बाहर नहीं निकल पा रही है। 

रामकृपाल सिंह: मैं किसी भी चीज को उस समय के परिपेक्ष्य में नहीं देखता हूं। बल्कि, उसे ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में देखता हूं। यह मानकर चलिए कि लोकसभा में हंगामा और लोकतंत्र की हत्या जैसे शब्द आपको सुनाई देते रहे  हैं और आगे भी सुनाई देंगे। लंबे समय तक इस देश ने गठबंधन की सरकारें देखी हैं। अगर यह भाजपा के लिए संकट है तो विपक्ष के लिए भी यह बड़ा संकट है, वह लगातार तीसरी बार विपक्ष में है। भाजपा का कोई राष्ट्रीय विकल्प है तो वह कांग्रेस है। कांग्रेस को 99 से 272 सीटों तक पहुंचने की चिंता करनी चाहिए। प्रचंड बहुमत लोकतंत्र के लिए बहुत अच्छा नहीं होता है। 
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विनोद अग्निहोत्री: प्रचंड शब्द अपने आप में बहुत खतरनाक है। कांग्रेस भी जब प्रचंड बहुमत से आती थी तो उसकी भी मनमानियां हमने देखी हैं। भाजपा को भी जब प्रचंड बहुमत मिला तो हमने देखा कि किस तरह से कई ऐसे फैसले लिए गए जो कई लोगों को पसंद नहीं आए। इस बार 240 सीटें मिलने के बाद हमने देखा कि जैसे ही किरण रिजिजू संसदीय कार्य मंत्री बने वो मल्लिकार्जुन खरगे से मिलने पहुंचे। इससे पहले की दो सरकारों में ऐसा नहीं देखा गया था। मुझे लगता है कि इस तरह के अंकगणित के बाद एक बेहतर वातावरण बनेगा। जहां तक राहुल गांधी के नेता प्रतिपक्ष बनने की बात है तो कांग्रेस वर्किग कमेटी ने प्रस्ताव पारित करके राहुल गांधी से अनुरोध किया है कि वो नेता प्रतिपक्ष का पद स्वीकारें। वर्किंग कमेटी में तभी प्रस्ताव आता है जब यह तय हो जाता है कि ऐसा होना है। मुझे लगता है कि यह तय हो गया है कि राहुल गांधी नेता प्रतिपक्ष बनेंगे तभी यह प्रस्ताव पारित हुआ है। 

राकेश शुक्ल: अभी की स्थिति में संसद में तीन धड़े हैं। सत्ता पक्ष का एक धड़ा और विपक्ष के दो धड़े हैं। वाईएसआर कांग्रेस, बीजद जैसे दल कांग्रेस के साथ मिलकर नहीं चल सकते हैं। सबसे पहले चुनौती तो यही होगी कि विपक्ष को एक होकर चलना होगा। अगर विपक्ष एकजुट हो सका तब ही वो सत्तापक्ष पर नकेल डाल सकेगा। जहां तक सत्ता पक्ष की बात है तो यह हमेशा से उसकी जिम्मेदारी रही है कि वो विपक्ष को लेकर चले। 

समीर चौगांवकर: भाजपा ने बीते 10 साल जो सरकार चलाई है वह एकाधिकार की सरकार रही है। भले एनडीए के मंत्री बनते थे लेकिन सरकार भाजपा की होती है। अब जो एनडीए की सरकार बनी है उसमें लगता है कि यह एनडीए की सरकार है। सहयोगियों को साथ लेकर चलना इस बार भाजपा की मजबूरी है। जनता ने बता दिया है कि लोकतंत्र में जनता सर्वोपरी होती है। देश के अदंर जो मतदाता है वो एक ही टकसाल में ढला हुआ सिक्का नहीं है।  विपक्ष के 234 सांसदों की समूहिक शक्ति इस बार सरकार के सामने रहेगी। सरकार का कामकाज उसी प्रकार रहेगा जैसे किरण रिजिजू ने मल्लिकार्जुन खरगे से मिलने चले गए। मुझे लगता है कि इस बार विपक्ष की बात भी सुनी जाएगी और विपक्ष को इतनी आसानी से खारिज नहीं किया जा सकेगा। 

2004 से 2014 तक राहुल गांधी के पास कई मौके थे जब वो सरकार का हिस्सा बनकर अपनी जिम्मेदारी निभा सकते थे 2014 और 2019 में भी राहुल गांधी सदन में पार्टी के नेता बन सकते थे। राहुल गांधी के पास लंबा समय था। 20 साल के संसदीय कार्यकाल में क्या राहुल गांधी ने उस तरह से काम किया है? मुझे लगता है कि राहुल गांधी इस मामले में चूक गए हैं। राहुल गांधी को देश की जनता अगर विकल्प के रूप में देखती है तो उनके पास पांच साल का यह मौका है जिसमें वो जनता के मुद्दों पर सरकार को घेर सकते हैं। तब जनता को लग सकता है कि राहुल विकल्प हो सकते हैं। लेकिन, मुझे लगता है कि राहुल गांधी जिम्मेदारी लेने से बचते रहे हैं। अब राहुल गांधी के ऊपर है वो खुद को किस तरह से पेश करते हैं।

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