बिहार में चुनाव की आहट से पहले ही सियासी रार जारी है। बिहार विधानसभा के अंतिम बजट सत्र के दौरान मुख्यमंत्री बनाने के बयानों की बाढ़ रही। चुनाव के बाद नीतीश मुख्यमंत्री बनेंगे या नहीं बनेंगे इस पर हर कोई अपना-अपना दावा कर रहा है। इन सभी मुद्दों पर इस हफ्ते खबरों के खिलाड़ी में चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, विनोद अग्निहोत्री, पूर्णिमा त्रिपाठी, राकेश शुक्ल, अवधेश कुमार और अजय सेठिया मौजूद रहे।
अवधेश कुमार: बिहार में केवल चुनाव आए तभी राजनीति हो, यह तो बिहार में हो नहीं सकता है। चुनाव इस समय आ गए हैं। जहां तक राजनीति का सवाल है तो नीतीश कुमार ने जो कुछ कहा है उससे नीतीश के अंदर इस बात का पश्चाताप है, उनके लिए यह राजनीतिक मजबूरी हो गई है कि वो जोर से बोलकर दिखाते हैं कि मैं जहां हूं वहीं रहूंगा। 2020-21 के वक्त तेजस्वी यादव की अच्छी लोकप्रियता थी। नीतीश कुमार ने उन्हें उपमुख्यमंत्री बनाकर ये पॉपुलैरिटी कम कर दी। ये भी गलत नहीं है कि तेजस्वी ने उन्हें दो बार मुख्यमंत्री बनवाया है।
विनोद अग्निहोत्री: नीतीश कुमार किसी से सलाह नहीं लेते। नीतीश कुमार के सामने 2013-14 में एक ही रास्ता था कि या तो वो भाजपा के सामने समर्पण कर दें या लालू के साथ समझौता कर लें। उन्होंने लालू से समझौते का रास्ता चुना। वहीं, यह कहना कि नीतीश कुमार ने लालू यादव को मुख्यमंत्री बनवाया तो यह तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है। लालू यादव को मुख्यमंत्री चौधरी देवीलाल और शरद यादव ने व्यूह रचना करके बनवाया था। इसी तरह 2015 में नीतीश को तेजस्वी ने मुख्यमंत्री नहीं बनवाया था। ये जरूर है कि लालू यादव कह सकते हैं कि उन्होंने 2015 में नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनवाया।
राकेश शुक्ल: नीतीश कुमार कई बार भाजपा के प्रति समर्पण जता चुके हैं। यहां विषय यह नहीं है कि किसने किसे मुख्यमंत्री बनाया। यहां पर विषय ये है कि आगे मुख्यमंत्री कौन बनेगा। ये सारी छटपटाहट इसी को लेकर है। बिहार के दोनों गठबंधन को देखेंगे तो विपक्ष के गठबंधन से ज्यादा बेहतर स्थिति में एनडीए गठबंधन आज की तारीख में दिखाई देता है। इसी समीकरण को बनाने बिगाड़ने की राजनीति चल रही है।
अजय सेठिया: मेरा मानना है कि नीतीश कुमार जब तक चाहेंगे वो बिहार के मुख्यमंत्री बने रहेंगे। भाजपा इस समय यह अफोर्ड नहीं कर सकती कि नीतीश का चेहरा आगे करके चुनाव नहीं लड़ा जाए। अगर वो मुख्यमंत्री नहीं बनेंगे उसके बाद क्या होता है वो सब जो कुछ भी होगा वो नीतीश कुमार की सहमति से होगा।
रामकृपाल सिंह: आज की तारीख में भाजपा के लिए जितने जरूरी नीतीश हैं, उतने ही नीतीश के लिए भाजपा जरूरी है। 240 सीटें पाने के बाद भाजपा को जो शॉक लगा था उसकी भरपाई हरियाणा से, महाराष्ट्र से, दिल्ली से हुई है। आज की तारीख में एनडीए गठबंधन विपक्षी गठबंधन पर बहुत भारी है। मुझे लगता है कि यह चुनाव भी नीतीश के चेहरे पर लड़ा जाएगा।
पूर्णिमा त्रिपाठी: मैं इस बात से पूरी तरह से सहमत हूं कि अगर नीतीश चाहेंगे तभी मुख्यमंत्री के चेहरे में बदलाव होगा। नीतीश अगर दूसरे पाले में चले जाते हैं तो यह भाजपा के लिए बहुत बड़ा झटका होगा। 2015 में जब पीएम मोदी की लोकप्रियता चरम पर थी उसके बाद भी कैसे नीतीश ने लालू के साथ मिलकर कैसे जीत दर्ज की थी, उसे भाजपा नहीं भूली होगी।