Khabron ke Khiladi: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का 'बंटेंगे तो कटेंगे' का नारा सबसे ज्यादा चर्चा में रहा। इसके पक्ष और विपक्ष दोनों की ओर से समर्थन और विरोध के सुर सुनाई दिए। इस हफ्ते के खबरों के खिलाड़ी में इसी पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, समीर चौगांवकर, अवधेश कुमार, पूर्णिमा त्रिपाठी और अनुराग वर्मा मौजूद रहे।
महाराष्ट्र में चुनावी प्रचार अपने अंतिम दौर में पहुंच गया है। प्रचार के दौरान दोनों अहम गठबंधनों की ओर से बयानों के बाण छोड़े गए। इस दौरान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का 'बंटेंगे तो कटेंगे' का नारा सबसे ज्यादा चर्चा में रहा। इसके पक्ष और विपक्ष दोनों की ओर से समर्थन और विरोध के सुर सुनाई दिए। इस हफ्ते के खबरों के खिलाड़ी में इसी पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, समीर चौगांवकर, अवधेश कुमार, पूर्णिमा त्रिपाठी और अनुराग वर्मा मौजूद रहे।
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पूर्णिमा त्रिपाठी: बंटोगे तो कटोगे का नारे आने बाद ही लगा था कि यह मुद्दा बनेगा और यह मुद्दा बना भी। महाराष्ट्र भाजपा के नेताओं के भी जिस तरह बयान आए साथ ही अजित पवार जैसे सहयोगियों के बयान के साथ आपसी खींचतान सामने आ गए। महाराष्ट्र की जमीनी सच्चाई उत्तर प्रदेश से अलग है। इस नारे की वजह से गठबंधन के अंदर के मतभेद सामने आ गए।
रामकृपाल सिंह: इस नारे पर हम आज भी चर्चा कर रहे हैं। जब से योगी आदित्यनाथ ने यह नारा दिया तब से ही इस पर चर्चा है। महाराष्ट्र में दोनों गठबंधन की स्थिति ऐसी है कि मैं किसी के साथ और मेरा दिल किसी साथ। इस नारे के लिए सबसे ज्यादा उर्वरा भूमि कहीं है तो महाराष्ट्र है। अगर आप इतिहास देखें तो महाराष्ट्र में बंटवारे की दरार सबसे ज्यादा रही है। मुझे लगता है कि यह नारा चल गया है। बाकी तो अगले शनिवार को जब नतीजे आएंगे तो सब साफ होगा।
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अवधेश कुमार: एक और दो बयान को अगर हम यह कहेंगे कि इस नारे के प्रति गुंजन है तो गुंजन शब्द का मतलब बदलना होगा। महाराष्ट्र हिदुत्व की लड़ाई का सबसे बड़ा केंद्र रहा है। वहां के संस्कार और चरित्र में हिदुत्व है। उसके विरोध की शक्तियां भी तब से वहां है। बाला साहेब ठाकरे एग्रेसिव हिंदुत्व के लिए प्रखर रहे हैं। अगर भाजपा में देवेंद्र फडणवीस की ओर से या शिंदे की शिवसेना की ओर से इसका विरोध होता तो मैं मानता कि इस नारे का विरोध है। गठबंधन होने पर अजित पवार अपने वोटबैंक को थोड़े ही छोड़ देंगे, ऐसा नहीं होगा।
अनुराग वर्मा: आज से पांच-सात साल पहले टीवी डिबेट में कांग्रेस और उसकी विचारधारा के लोग कहते थे कि सेक्युलर वोट बंटना नहीं चाहिए। अगर आप सेक्युलर वोट को नहीं बंटने की बात करते हैं तो हिंदू वोट नहीं बंटने की बात आई। ये कई वर्षों से जेहन में थी, योगी आदित्यनाथ ने इसे शब्द दे दिया है। बहुत से अपराधियों को सिर्फ इस वजह से वोट मिलता है कि वो किसी जाति विशेष से आते हैं। हर जगह का वोटर इसी तरह से सोचता है।
समीर चौगांवकर: 26 अगस्त को आगरा में योगी आदित्यनाथ ने यह बयान दिया था। उसके बाद से ये नारा बहुत तेजी से पूरे देश में चला। महाराष्ट्र की राजनीति की बात करेंगे तो यहां एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो इस नारे से सहमत है वहीं, एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो इससे सहमत नहीं है। अजित पवार की राजनीतिक मजबूरी थी इस नारे का विरोध करना। उन्होंने भविष्य की राजनीति के हिसाब से चीजों को देखा है। महाराष्ट्र में जिस तरह से मराठवाड़ा में जिस तरह से ओबीसी और मराठा बंट गए उसका असर यहां देखा गया। कुछ लोगों को लग रहा है कि यह दो धारी तलवार है। इसका हमें नुकसान होगा। भाजपा की कोशिश है कि जो जाति के आधार पर 2024 के चुनाव वोट बंट गया था और उसका उसे नुकसान हुआ था वो नुकसान कम हो सके।