बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पिछले दिनों सदन में एक ऐसा बयान दिया, जिसकी भाषा पर सभी ने आपत्ति जताई। उनके बयान पर प्रतिक्रियाएं भी आईं। बाद में नीतीश कुमार ने अपने वक्तव्य पर माफी मांग ली। अब यह सवाल उठ रहा है कि महिलाओं की शिक्षा और प्रजनन दर के मुद्दे पर दिए गए नीतीश कुमार के बयान से उनकी छवि और विपक्षी गठबंधन पर कितना असर पड़ेगा। 'खबरों के खिलाड़ी' की इस कड़ी में इस बार चर्चा के लिए हमारे साथ विनोद अग्निहोत्री, राहुल महाजन, प्रेम कुमार, संजय चौगांवकर और संजय राणा मौजूद थे। पढ़ें इस चर्चा के अंश...
नीतीश कुमार के बयान पर लोगों को यकीन नहीं हुआ। राजद ने उनका बचाव भी किया। इसे किस तरह देखते हैं?
विनोद अग्निहोत्री: उनके बयान को जायज नहीं ठहराया जा सकता। उनका मुद्दा ठीक था, लेकिन उन्होंने जिस शब्दावली का चयन किया, वह सही नहीं था। वे जिस शैली में यह बात कह गए, वह सभ्य तरीका नहीं था। नीतीश कुमार जैसे गंभीर व्यक्ति जब इस तरह की बात करते हैं तो आश्चर्य होता है। वे जिस विचारधारा से आते हैं, उसमें महिलाओं को जबर्दस्त सम्मान दिया जाता है। उन्हें इसका एहसास हुआ होगा, तभी उन्होंने माफी मांगी। जब व्यक्ति खुद उस गलती को मानकर क्षमा मांग ले तो उस बात को वहीं छोड़ दिया जाना चाहिए।
क्या यह बयान नीतीश की छवि के विपरीत है?
राहुल महाजन: नीतीश कुमार की महिला विरोधी छवि नहीं रही है। उन्होंने शराब बंदी की। आरक्षण की वकालत की। बच्चियों को लेकर उन्होंने योजनाएं चलाई हैं। मुद्दा उन्होंने सही उठाया, लेकिन उनकी भाषा आपत्तिजनक थी। हमारे समाज में जो दोगलापन है, उसकी भी बात होनी चाहिए। यौन शिक्षा पर फिल्में आ रही हैं या ओटीटी पर आने वाली सीरीज में जिस तरह की भाषाओं का उपयोग हो रहा है, हम उसे तो स्वीकार कर लेते हैं, लेकिन एक नेता जब ऐसी बात कह देता है और बाद में अपनी गलती मानकर माफी मांग लेता है तो आगे राजनीति नहीं होनी चाहिए।
इंडिया गठबंधन की नींव रखने वालों में नीतीश शामिल थे। उनके बयान से कितना नुकसान होगा?
प्रेम कुमार: इंडिया गठबंधन पर नीतीश कुमार के बयान का तब असर पड़ेगा, जब उनके खिलाफ कोई बड़ा आंदोलन होगा। सदन के भीतर सदस्यों का विशेषाधिकार होता है। जब से टीवी पर सदन की कार्यवाही का प्रसारण होने लगा है, इस विशेषाधिकार पर ही प्रश्न चिह्न लग गया है। सार्वजनिक विमर्श होता तो आपत्ति ठीक होती, लेकिन यह सोचना होगा कि सदन का विशेषाधिकार कैसे सुरक्षित होगा। बाहरी प्रभाव से तटस्थ रहते हुए सदन अपना काम कर सके, उस विचार को ही ठेस पहुंच रही है। नीतीश कुमार ने जो मुद्दा उठाया, लोग दबे-छुपे उस मुद्दे का समर्थन तो कर ही रहे हैं।
इंडिया गठबंधन की नींव रखने वालों में नीतीश शामिल थे। उनके बयान से गठबंधन को कितना नुकसान होगा?
समीर चौगांवकर: 40 वर्ष में नीतीश कुमार की अपनी पार्टी के अंदर स्वीकार्यता रही है। उनका जीवन साफ छवि का रहा है, लेकिन अब उनका बयान निंदनीय है। उम्र के एक दौर में आकर ऐसा हो जाता है। बाद में उन्होंने माफी भी मांग ली। इंडिया गठबंधन में नीतीश कुमार की भूमिका बनी रहेगी। एक बयान से उनकी स्वीकार्यता नहीं घटेगी। कांग्रेस भी जानती है कि राहुल गांधी या मल्लिकार्जुन खड़गे से ज्यादा लोग नीतीश की बात सुनेंगे। नीतीश ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल जैसे नेताओं से अपनी बात मनवा सकते हैं।
प्रशांत किशोर कह रहे हैं कि यह नीतीश कुमार की राजनीति का अंतिम पड़ाव है। क्या उनका कद घटेगा?
संजय राणा: नीतीश कुमार जैसे पढ़े-लिखे व्यक्ति की सदन में कही गई शब्दावली सही नहीं है। विदेशों में ऐसे आरोप लगते हैं तो नेताओं को मानसिक रूप से स्वस्थ होने का सर्टिफिकेट देना पड़ता है। नीतीश कुमार अपने राजनीतिक स्तर से गिरते चले जा रहे हैं। देश में भी उनका अब वैसा कद नहीं है। गठबंधन तो कोई भी किसी के भी साथ बना सकता है। मध्य प्रदेश में सपा-कांग्रेस में झगड़ा है। उस गठबंधन के दल ही उसे इज्जत नहीं दे रहे। क्षेत्रीय दलों के गठबंधन से क्या फायदा मिलेगा? यह गठबंधन कुछ महत्वाकांक्षी लोगों का गठजोड़ है। नीतीश कुमार की पार्टी को यह गठबंधन पांच से ज्यादा लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने दे तो यह बड़ी बात होगी।
क्या लोकसभा चुनाव तक यह मुद्दा बना रहेगा?
विनोद अग्निहोत्री: मुद्दे बहुत क्षणिक होते हैं। पहले लग रहा था कि सनातन का मुद्दा 2024 तक चलेगा, वैसा हुआ नहीं। यह मुद्दा भी ज्यादा दिन नहीं टिकेगा। नीतीश कुमार के बयान को इसलिए भी ज्यादा तूल दिया गया है क्योंकि जातीय जनगणना के आंकड़े जारी हुए हैं। एक तरफ उत्तर प्रदेश में दीपावली में दीये जलाए जा रहे हैं, भव्य राम मंदिर बन रहा है। दूसरी तरफ, बिहार में सामाजिक न्याय की अवधारणा के तहत जातीय जनगणना के आंकड़े जारी हुए। यह इतना बड़ा खुलासा है, जो पूरे देश की राजनीति को बदलने की क्षमता रखता है। भाजपा यह जानती है। मंडल आयोग के दौर की राजनीति के समय भाजपा यह देख चुकी है।
तो बड़ा सवाल यह है कि क्या नीतीश कुमार सत्ता में बने रहेंगे?
प्रेम कुमार: नीतीश कुमार अब यह सीख ले सकते हैं कि विरोधियों को कोई अवसर नहीं देना है। तुरंत माफी मांगकर उन्होंने इसका संकेत भी दिया है कि वे सीखने के लिए तैयार हैं।
राहुल महाजन: नीतीश कुमार की छवि को ज्यादा नुकसान होने का अंदेशा नहीं है। नीतीश कुमार विपक्ष के सर्वमान्य नेता हैं। जब पहली बार एनडीए बना था, तब जयललिता और ममता बनर्जी की सोच भाजपा से नहीं मिलती थी। इसलिए गठबंधन में ये सब चीजें मायने नहीं रखतीं।
समीर चौगांवकर: नीतीश कुमार की उम्र हो चुकी है। हो सकता है कि वे अगले लोकसभा चुनाव के बाद ज्यादा सक्रिय न रहें। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि अब बिहार में अगला मुख्यमंत्री कौन होगा। क्या तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री बनेंगे। अगर गठबंधन टूटता है तो नीतीश अपनी राजनीति किस तरह आगे बढ़ाएंगे। नीतीश कुमार के पास राजनीति में सक्रिय बने रहने के लिए लंबा समय नहीं है।
संजय राणा: नीतीश के बयान से उनकी छवि को बड़ा नुकसान नहीं पहुंचने वाला। उनके राजनीतिक करियर का ग्राफ तो वैसे भी गिरता जा रहा है। 2024 में अगर एनडीए की सरकार बन गई तो नीतीश कुमार की राजनीति खत्म हो जाएगी।
विनोद अग्निहोत्री: नीतीश कुमार से उम्र में तो प्रधानमंत्री मोदी, राजनाथ सिंह, मल्लिकार्जुन खड़गे बड़े हैं। वे 72 साल के हैं। अगर यह गठबंधन बना रहता है तो तेजस्वी यादव ही उनके उत्तराधिकारी के तौर पर नजर आते हैं। 2015 में जब महागठबंधन जीता था, उसके बाद अगर 2017 में नीतीश कुमार पाला नहीं बदलते तो आज वे विपक्ष के सबसे बड़े नेता होते। उन्होंने 2015 में जो हासिल किया, वह बाद में बिखर गया। उनकी व्यक्तिगत साख अच्छी रही है, वे आर्थिक रूप से ईमानदार माने गए, लेकिन उनकी राजनीतिक साख और विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा है। भाजपा के पास बिहार में ऐसा कोई चेहरा नहीं है, जो नीतीश का विकल्प हो। तेजस्वी यादव अगर मुस्लिम-यादव समीकरण के दायरे को बढ़ाकर पिछड़े, अति पिछड़े, दलित और सर्वणों को साध लेते हैं तो उनके पास मौका है।