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Khabaron Ke Khiladi: क्यों ठप पड़े हैं संसद के दोनों सदन, किसकी जिम्मेदारी ज्यादा? विश्लेषकों से जानिए

Sat, 07 Dec 2024 05:00 PM IST
अभिषेक दीक्षित न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

संसद का शीतकालीन सत्र अब तक व्यवधान के लिए सुर्खियों में है। विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच गतिरोध जारी है। क्या इससे जनता से जुड़े मुद्दों का कितना नुकसान हो रहा है? इन्हीं सवालों पर इस हफ्ते के खबरों के खिलाड़ी में चर्चा हुई।
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खबरों के खिलाड़ी - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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संसद का शीतकालीन सत्र चल रहा है। 25 नवंबर से शुरू हुआ सत्र अब तक काम से ज्यादा व्यवधान के लिए सुर्खियों में रहा है। विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच गतिरोध जारी है। किसी दिन 10 मिनट तो किसी दिन 15 मिनट सदन चला। आखिर इस गतिरोध के पीछे की वजह क्या है? इससे जनता से जुड़े मुद्दों का कितना नुकसान हो रहा है? इन्हीं सवालों पर इस हफ्ते के खबरों के खिलाड़ी में चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, विनोद अग्निहोत्री, समीर चौगांवकर, पूर्णिमा त्रिपाठी और अवधेश कुमार मौजूद रहे। 

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पूर्णिमा त्रिपाठी: ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि संसद चल नहीं पा रही है। सिर्फ दो तीन मुद्दे हैं जो महाराष्ट्र चुनाव में उठाए गए थे। वही फिर से दोहराए से जा रहे हैं। जो नारे और जो मुद्दे चुनावी भाषणों में उठाए जा रहे थे, वही सदन में उठाए जा रहे हैं। लोग सकारात्मक बहस देखना और सुनना चाहते हैं। इसमें जितना विपक्ष जिम्मेदार है, उतना ही सत्तापक्ष भी जिम्मेदार है। सदन में ऐसी बातें हो रही हैं, जिनका देश के लोगों से कोई सरोकार नहीं है। 

रामकृपाल सिंह: पहले यह होता था कि विपक्ष विमर्श से सत्तापक्ष को झुका देता था। मैं नहीं मानता कि विपक्ष का उद्देश्य सिर्फ संसद को बाधित करना होता है। आजकल यह होता है कि हंगामा जिसने कर लिया, वो ज्यादा ताकतवर समझा जा रहा है। ऐसा मत समझिए कि जनता सिर्फ श्रीराम और अल्लाह के नाम पर वोट करती है। सबके जीवन में बुनियादी जरूरतें होती हैं। इसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी है। गंभीर टिप्पणी करने के लिए बहुत अध्ययन की जरूरत होती है, जो मुझे आज के जनप्रतिनिधियों में दिखाई नहीं देती है। 
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अवधेश कुमार: किसी का दिमाग अगर पीछे अटका हुआ है तो क्या किया जा सकता है। दुनिया कभी रुकती नहीं है। भारत ने योग दिवस के बाद ध्यान दिवस का प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र में पारित कराया है। ये देश के लिए गर्व की बात है। क्या इस विषय पर संसद का विशेष सत्र नहीं बुलाया जा सकता है? मुझे लगता है कि संसद का सत्र अब तो चलेगा। 

समीर चौगांवकर: संसद के साल में तीन ही सत्र होते हैं। बजट, मानसून और शीतकालीन सत्र होता है। ये सब मिलाकर एक महीने के करीब होता है। इस साल में एक महीने भी संसद में सांसद सार्थक बहस नहीं कर सकें तो क्या कहा जा सकता है। मुझे लगता है कि यह दोनों पक्षों का काम है कि संसद चले। सत्र चलाने में सरकार की बड़ी भूमिका होती है। विपक्ष को ज्यादा चिंता होनी चाहिए कि सत्र चले। वो सदन में ऐसे मुद्दे लेकर आ सकता है, जिससे सरकार एक्सपोज हो जाए, लेकिन सिर्फ हंगामा करने से कुछ नहीं निकलेगा। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को इसे लेकर गंभीरता से चर्चा करने की जरूरत है। 

विनोद अग्निहोत्री: संसद में बात होनी चाहिए, बहस होनी चाहिए और मुद्दे उठने चाहिए। झांसी की घटना को वहां के सांसद तक ने नहीं उठाया क्योंकि वो भाजपा से हैं और राज्य में भाजपा की सरकार है। अगर मुद्दे दल के हिसाब से उठेंगे तो यह होगा। लंबे समय तक कार्यवाही को रोकना भी सही नहीं है। ऐसे में कई कानून बिना चर्चा के भी पारित हो जाते हैं। बेहतर यह है कि आप चर्चा करें और जिस पर आपकी सहमति ना हो तो आप बहिर्गमन करें। मुझे लगता है कि जिम्मेदारी दोनों पक्षों की है और सबसे बड़ी जिम्मेदारी सरकार की है।

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