पश्चिम एशिया में तनाव चरम पर है। इस संघर्ष को एक महीने से ज्यादा हो चुके हैं। इस संघर्ष का असर अब भारत समेत पूरी दुनिया पर पड़ रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का रुख हर दिन बदल रहा है। डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ उनके ही घर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष किस ओर जा रहा है? क्या ईरान पर हमला करके ट्रंप फंस गए हैं? इस हफ्ते कुछ ऐसे ही सवालों पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, विनोद अग्निहोत्री, पूर्णिमा त्रिपाठी, राकेश शुक्ल और अजय सेतिया मौजूद रहे।
रामकृपाल सिंह: आज की तारीख में ये संघर्ष दो अहंकारी सत्ताओं का संघर्ष है। दोनों इस वक्त घायल हैं इसलिए दोनों घातक हैं। एक मानता है कि ये एक ध्रुवीय दुनिया है और हम इस पर राज करेंगे। दूसरा ये मानता है कि ऊपरवाले ने ये धरती सिर्फ हमारे लिए बनाई है। मैं यह कहता हूं की ये दो अहंकारियों की लड़ाई है इस लड़ाई में कौन जीतेगा कौन हारेगा ये नहीं कहा जा सकता है।
अजय सेतिया: ट्रंप का अमेरिका में विरोध शुरू हो चुका है। महंगाई वहां बहुत बढ़ गई है। दैनिक काम करने वाले लोगों का जीवन दूभर हो गया है। ट्रंप को पहली बार अपने देश की जनता को संबोधित करना पड़ा। जिस तरह रूस यह समझता था कि हम यूक्रेन को चंद दिनों में खत्म कर देंगे, वैसे ही अमेरिका को भी लगता था कि हम ईरान को चंद दिनों में खत्म कर देंगे। पर ऐसा हुआ नहीं। वो सात दिन की बात मान रहे थे अब वो फंस गए हैं। ट्रंप अपनी बात हर रोज बदल रहे हैं। हर रोज उनका बदलना उनकी छवि को नुकसान पहुंचा रहा है। अब वो अपने अस्तित्व की लड़ाई अमेरिका में लड़ रहे हैं।
पूर्णिमा त्रिपाठी: ईरान 40 साल से इसी की तैयारी कर रहा था। अगर ट्रंप को जरा सा भी आइडिया होता तो वो ये कोशिश नहीं करते। अब ट्रंप को समझ नहीं आ रहा है कि आगे क्या करना है। ट्रंप अब फंस गए हैं, उनको उनके ही मित्रों ने किसी भी तरह की मदद देने से मना कर दिया। जिस तरह से उनके बयान बदल रहे हैं, जिस तरह वो एडमिनिस्ट्रेशन में बदलाव कर रहे हैं। एक तरह से वो धीरे-धीरे हाथ झाड़ रहे हैं। वो अपने देश में भी फंस गए हैं।
राकेश शुक्ल: भारत अपना गुटनिरपेक्ष देश है। विपक्ष जो आरोप लगाता है तो उसे भी अपना ब्लू प्रिंट देना चाहिए कि अगर वो सत्ता में होता तो उसके इस स्थिति में क्या कदम होते। हमारे यहां आज भी एक साल के लिए यूरिया और डीएपी का भंडारण है। हमारे यहां अन्य देशों के मुकाबले पर्याप्त मात्रा में तेल और गैस है इसके बाद भी क्या हमें प्रश्न खड़ा करना चाहिए।
विनोद अग्निहोत्री: ये एक अहंकारी देश और एक अपनी रक्षा के लिए लड़ रहे देश की लड़ाई है। ईरान ने हमला नहीं किया, वो सबकुछ मानने के लिए तैयार था, उसके बाद भी हमला किया गया। उसे इस दिन का अंदाजा था इसलिए वो लड़ रहा है। बहुमत की सेंपेथि ईरान के साथ इसलिए है क्योंकि उन्हें लग रहा है कि कोई तो है जो अमेरिका के खिलाफ खड़ा हुआ। 47 साल में तामाम प्रतिबंधों के बावजूद वहां 99 फीसदी साक्षरता है। कई मामलों में ईरान आगे निकल चुका है। ईरान में कट्टरपंथी शासन है, लेकिन वहां नियमित तौर पर चुनाव होते हैं। ये तय करना वहां के लोगों का काम है कि वहां की शासन व्यवस्था कैसी हो। कोई अमेरिका या इस्राइल यह तय नहीं कर सकता है।