बिहार में चुनावी बिगुल बज चुका है। चुनावी तारीखों का एलान हो गया है। इस बार दो चरण वोट डाले जाएंगे। 14 नवंबर को नतीजा आ जाएगा। इस हफ्ते बिहार में वह कौन से मुद्दे होंगे जो वोटर्स को पोलिंग बूथ तक ले जाएंगे। बिहार में सत्ता की कुर्सी तक कौन पहुंचेगा। जो वादे किए जा रहे हैं इन वादों का क्या होगा?
बिहार में चुनावी बिगुल बज चुका है। चुनावी तारीखों का एलान हो गया है। इस बार दो चरण वोट डाले जाएंगे। 14 नवंबर को नतीजा आ जाएगा। इस हफ्ते बिहार में वह कौन से मुद्दे होंगे जो वोटर्स को पोलिंग बूथ तक ले जाएंगे। बिहार में सत्ता की कुर्सी तक कौन पहुंचेगा। जो वादे किए जा रहे हैं इन वादों का क्या होगा? इसे कैसे पूरा किया जाएगा? सबसे बड़ी बात कि यह जो सीटों का बंटवारा और जो गठबंधन की पूरी कहानी चल रही है, यह क्या चुनाव से पहले और चुनाव के बाद इसी स्थिति में दिखाई पड़ेगी? कुछ ऐसे ही सवालों पर इस हफ्ते खबरों के खिलाड़ी में चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, विनोद अग्निहोत्री, पूर्णिमा त्रिपाठी, अवधेश कुमार और राकेश शुक्ल मौजूद रहे।
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अवधेश कुमार: बिहार की जो स्थिति है ना उसमें गठबंधन के ज्यादा उथल-पुथल की संभावना है ही नहीं। जो चर्चा हो रही है वह मुख्य चर्चा एनडीए के अंदर चिराग पासवान की हो रही है। बाकी तो ज्यादा दिक्कत नहीं। अब चिराग पासवान के बारे में हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि वह केंद्र में मंत्री पद त्यागने नहीं जा रहे हैं। उनके साथ है। दूसरा दूसरी ओर कहां जा सकते हैं? घोषणा होगी तो कुछ उम्मीदवार विद्रोह करते हैं। एक स्वाभाविक स्थिति हर चुनाव में होती है। वह बिहार में भी होगा। विधानसभा में उपमुखमंत्री ने कहा कि हमारे नेता नीतीश हैं। उनके नेतृत्व में हम चुनाव लड़ रहे हैं। इस समय तो मेरी दृष्टि से वहां चुनाव की तस्वीर बिल्कुल स्पष्ट है। प्रशांत किशोर ने मुद्दे उठाए हैं, लेकिन मैंने जो चारों तरफ पता किया है, किसी जिला में किसी एक क्षेत्र में मुझे नहीं दिखाई दिया है कि उनका कोई मेजर वोट बैंक क्रिएट हुआ है। अगले चुनाव में कुछ हो जाए तो अलग है। लेकिन, दो स्थापित गठबंधन को तोड़ कर के तीसरा गठबंधन कुछ बढ़िया प्रदर्शन करे यह तभी होता है जब सरकार के विरुद्ध एक असंतोष का वातावरण हो, उथल-पुथल हो और दूसरे को लोग बिल्कुल नापसंद कर रहे हों।
राकेश शुक्ल: प्रशांत किशोर जी दावा कर रहे हैं। दावा राजनीति में होता है। हर पार्टी दावा करती है। आरजेडी भी कर रही है, भारतीय जनता पार्टी भी कर रही है। हम प्रशांत किशोर जी को कमतर आंक के नहीं चल रहे। उसका कारण है। रिजल्ट क्या आएगा मैं नहीं जानता। लेकिन मौजूदा समय पर प्रशांत किशोर ने भारतीय जनता पार्टी, आरजेडी और जेडीयू को सफाई देने के लिए मजबूर कर दिया है। वह जिस तरीके के मुद्दे उठा रहे हैं। उसमें जो पार्टियां कभी एजेंडा तय किया करती थी, वह पार्टियां आज सफाई दे रही हैं। चाहे वह अशोक चौधरी का मामला हो, चाहे सम्राट चौधरी का मामला हो। यह ऐसे इशू हैं जिस इशू पर भारतीय जनता पार्टी हो, जेडीयू हो, सबको सफाई के लिए उतरना पड़ रहा है कि नहीं ऐसा नहीं प्रशांत किशोर जो कह रहे हैं वो सही नहीं है।
रामकृपाल सिंह: हमेशा बिल्कुल चुपचाप ढंग से जो आम वर्कर है, आम आदमी है, उसकी जिंदगी में जो बदलाव आया है। उसमें बहुत हद तक स्टेट को केंद्र ने रिप्लेस कर दिया है। यह आप समझ लीजिए जो वोट में दिखाई पड़ता है। ऐसा नहीं कि पोलराइजेशन पहली बार हो रहा है। होता रहा है। बहुत सारी चीजें होती है। मैं मानता हूं। लेकिन जो जीवन के संघर्ष के जो बिंदु हैं उसमें बदलाव आया है। फ्री बीज का देखिए पहली बात तो यह है कि शुरुआत कहां से हुई है। कोई पार्टी दूध की धुली हुई नहीं है। राजनीति में कहां कब क्या किया जा सकता है। उसकी एक अलग-अलग चीजें होती हैं।
पूर्णिमा त्रिपाठी: मुझे लग रहा है कि हम बहुत सारी चीजों को बहुत टेकन फॉर ग्रांटेड ले रहे हैं। कई सारे मुद्दे हैं जो कि इस बार हमें नए दिखाई दे रहे हैं। उन मुद्दों को हम इग्नोर नहीं कर सकते हैं। जो एक हम मान के चल रहे हैं कि जितना भी सवर्ण तबका बिहार का है वो आंख मूंद के बीजेपी के पीछे गोलबंद हो गया है। मुझे नहीं लगता है कि वह 100% स्थिति है। एक बहुत बड़ी युवा बेरोजगारों की फौज वहां पर खड़ी है, जो आए दिन रोड पर पिटते रहते हैं, बैठे रहते हैं। उनको नौकरियां नहीं मिल रही हैं। उनके एग्जाम्स के पर्चे लीक हो जा रहे हैं। लोगों में नाराजगी है और हो सकता है उस नाराजगी में वह विकल्प तलाशने लगे। वह विकल्प कुछ भी हो सकता है। वह विकल्प या तो कांग्रेस हो सकती है या प्रशांत किशोर हो सकते हैं। ये अभी कहना बहुत जल्दी होगा। मुझे नहीं लगता है कि चुनाव एक तरफा है। अभी ऐसा कहना बहुत जल्दी होगा।
विनोद अग्निहोत्री: बिहार में इस बार देखिए ओवैसी फैक्टर को मैं बहुत ज्यादा फैक्टर नहीं मान रहा हूं। ओवैसी फैक्टर पिछली बार चल गया था और उसका नतीजा ये हुआ कि तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री बनते बनते रह गए। प्रशांत किशोर इस बार बड़ा फैक्टर हैं। प्रशांत किशोर को इग्नोर करना अनदेखा करना मुझे लगता है यह शायद राजनीतिक विश्लेषकों की भूल होगी। प्रशांत किशोर बिहार का एक चेहरा बन गए हैं। 2005 में नीतीश कुमार बिहार की उम्मीदों का चेहरा थे। वही, उम्मीद प्रशांत किशोर दिला रहे हैं। चुनाव दिलचस्प है बिहार का और अभी कहना मेरे लिए बहुत मुश्किल है कि किस तरफ हवा बह रही है।