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Khabaron Ke Khiladi: 40 दिन की तबाही फिर 14 दिन का ब्रेक, विश्लेषकों ने बताया प. एशिया में कब होगा युद्धविराम

Sat, 11 Apr 2026 05:12 PM IST
Kirtivardhan Mishra स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
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अमेरिका-ईरान के बीच युद्ध में 40 दिन बाद लगा सीजफायर, अब वार्ता जारी। - फोटो : अमर उजाला
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ईरान और अमेरिका की बीच चल रही जंग इस हफ्ते थम गई। जंग रुकने के बाद दोनों पक्षों की ओर से बातचीत के लिए शनिवार का दिन तय हुआ। चालीस दिन के युद्ध के बाद 14 दिन का विराम लगा है। ये विराम अस्थायी है या आगे भी जारी रह सकता है? गतिरोध कहां है? युद्ध पूरी तरह खत्म कब तक होगा? कुछ ऐसे ही सवालों पर इस हफ्ते खबरों के खिलाड़ी में चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री, अवधेश कुमार, पूर्णिमा त्रिपाठी, राकेश शुक्ल और अनुराग वर्मा मौजूद रहे। 
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अवधेश कुमार: ईरान में राजनीतिक नेतृत्व के साथ धार्मिक नेतृत्व भी है। ट्रंप ने एक कोशिश की है। ईरान जिन खलनायकों को खड़ा करता है उन्हें खत्म करने की कोशिश ट्रंप ने की। ये युद्ध रुक ही नहीं सकता है। ये उस मजहबी की सोच के खात्मे तक जारी  रहेगा। या फिर दूसरा पक्ष यहूदी सभ्यता के खत्म होने तक जारी रखेगा।
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पूर्णिमा त्रिपाठी: ये कहा जा रहा है कि ये युद्ध कभी खत्म हो नहीं सकता, लेकिन ये बताना होगा कि हमला पहले किसने किया। किसी की पिछलग्गू बनकर ट्रंप को हमला करने की क्या जरूरत थी। सीजफायर एक मजाक बनकर रह गया है। जबतक किसी समझौते में इस्राइल शामिल नहीं होगा तब तक ऐसी ही स्थिति रहेगी। किसी को धरती से मिटा देने के उद्देश्य से अगर कोई चल रहा है तो ये नहीं हो सकता है। भारत अब भी एक पहल करके दोनों पक्षों (ईरान और इस्राइल) को साथ ला सकता है। भारत दोनों पक्षों से बात कर सकता है। 

राकेश शुक्ल: किसी वार्ता में जब दो पक्षों के बीच बात होती है तो जो जगह चुनी जाती है, वो जरूरी नहीं है कि वो वार्ता में शामिल हो। पाकिस्तान एक इस्लामिक देश है और कहीं न कहीं अमेरिका के पीछे खड़े रहने वाले देशों में है। इसलिए उसका चुनाव दोनों पक्षों के मुफीद रहा। इस्राइल कहीं भी सीजफायर में नहीं है, वो आज भी हमले कर रहा है। ट्रंप डिप्लोमैटिक तरीके से बार-बार बयान देकर इस्राइल के लिए रास्ता तैयार कर रहे हैं। 
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अनुराग वर्मा: ट्रंप अपने देश में फंसे हैं। अमेरिका के लोग ही ट्रंप के कदम का विरोध कर रहे हैं। इसके चलते ट्रंप इस लड़ाई से निकलना चाहते हैं। ईरान की ताकत को अमेरिका ने शुरू में कम आंका। इस वक्त ट्रंप को एक सम्मानजनक एग्जिट चाहिए। जिससे वो ये कह सकें कि न तुम जीते न मैं हारा। और घर में उनकी इज्जत बची रहे। 

विनोद अग्निहोत्री: ईरान करो या मरो की स्थिति में है। अमेरिका अगर इस्राइल को लेबनान में हमले करने से रोक देता है तो चीजें ठीक हो सकती हैं। नाटो इस बार पूरी तरह बिखर गया। ये ट्रंप की बड़ी कूटनीतिक विफलता रही। ट्रंप अपने देश में घिरे हुए हैं। इस युद्ध का कोई नैतिक आधार ट्रंप नहीं दे पाए हैं। ईरान और इस्राइल की लड़ाई अस्तित्व की लड़ाई है। कुल मिलाकर स्थिति जटिल है और अमेरिका चाहे तब ही युद्ध विराम सफल होगा।
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