कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बहस की चुनौती दी है। एक्स पर लगातार वीडियो पोस्ट कर राहुल और कांग्रेस पीएम मोदी से डिबेट की मांग कर रहे हैं। दूसरी तरफ भाजपा और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राहुल को जवाब देते हुए कहा है कि वे संसद को चलने नहीं देते, मुद्दों पर चर्चा नहीं करते। अगर उन्हें बहस करनी है तो संसद में करें। इस बीच सियासी गलियारों में राहुल की पीएम को बहस की चुनौती को विपक्ष की नई रणनीति करार दिया जा रहा है। खबरों के खिलाड़ी में इस हफ्ते इसी पर चर्चा हुई। वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, पूर्णिमा त्रिपाठी और विनोद अग्निहोत्री ने राहुल की इस चुनौती का विश्लेषण किया और बताया कि यह रणनीति कितनी कारगर होगी।
राम कृपाल सिंह: किसी भी लक्ष्य के लिए ठोस रणनीति जरूरी होती है। राहुल गांधी की लोकप्रियता बेशक बढ़ी है और बदलाव चाहने वाले लोग उनकी ओर देख रहे हैं, लेकिन उनकी कार्यशैली 10 हॉर्स पावर के उस अनियंत्रित इंजन जैसी है जिसका पानी चारों तरफ बहकर बर्बाद हो जाता है, जबकि जरूरत केंद्रित क्यारी बनाकर सींचने की है। गुजरात में कांग्रेस बाहरी चेहरों पर निर्भर रही और यूपी में 40 साल बाद भी पार्टी 10 प्रमुख चेहरे नहीं गिना सकती। नेता की व्यक्तिगत ताकत संगठन की कमजोरी नहीं बननी चाहिए। जमीनी पकड़ के बिना महज प्रधानमंत्री पद की दावेदारी देखना व्यावहारिक नहीं है।
पूर्णिमा त्रिपाठी: जिस तरह तीन घंटे की फिल्म का पूरा रहस्य पहले पांच मिनट में सामने नहीं रखा जाता, उसी तरह राहुल भी सारे कथित सबूत तुरंत नहीं दिखाएंगे। उनका वास्तविक लक्ष्य 2027 नहीं, बल्कि 2029 का चुनाव है और वे तब तक इस दृश्य को खींचना चाहते हैं। उनका नैरेटिव यह जताना है कि उन्होंने चुनौती दी, लेकिन सामने वाला डर गया। राहुल संसद में बहस के लिए शायद ही तैयार हों, क्योंकि वहां माइक बंद होने और टोका-टोकी की बात कहकर वे इसे हवा में उछालना चाहते हैं। रैलियों में मिल रहे जनसमर्थन से उत्साहित कांग्रेस जनता के रुख को अपने पाले में रखने के लिए ऐसे सियासी प्रयोग लगातार करती रहेगी।
विनोद अग्निहोत्री: राहुल ने वोट चोरी और एसआईआर जैसे मुद्दों को बदला नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री मोदी द्वारा देशविरोधी ताकतों पर दिए गए भाषण का पलटवार किया है, क्योंकि चुप रहने पर सवाल उठते। अगर बात सही तरीके से रखी जाए तो जनता ऐसे मुद्दों को स्वीकार करती है। 2013-14 में भाजपा प्रवक्ता राहुल को मोदी जी से डिबेट की चुनौती देते थे और तब कांग्रेस बचती थी; आज 12 साल बाद राहुल चुनौती दे रहे हैं और भाजपा बचाव की मुद्रा में है। इसे राजनीति का विकास क्रम मानना चाहिए। भले ही कोई आमने-सामने की बहस न हो, लेकिन यह मुद्दा जनविमर्श में छा गया है और कांग्रेस को जवाब देने का मजबूत आधार मिला है।