Kesari Chapter 2: कौन थे शंकरन नायर, केसरी चैप्टर-2 में दिखेगी जिनकी कहानी, पीएम मोदी ने क्यों लिया उनका नाम?
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Tue, 15 Apr 2025 05:18 PM IST
सार
सी. शंकरन नायर कौन थे? नायर का जालियांवाला बाग नरसंहार से क्या रिश्ता था? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनका जिक्र क्यों किया? शंकरन नायर का कांग्रेस में क्या कद था और उनके महात्मा गांधी के साथ कैसे रिश्ते थे? आइये जानते हैं...
फिल्म केसरी चैप्टर-2 18 अप्रैल को सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है। इस फिल्म में अभिनेता अक्षय कुमार ने सी. शंकरन नायर का किरदार निभाया है। यह फिल्म 2019 में आई किताब- 'द केस दैट शूक द एंपायर: वन मैन्स फाइट फॉर ट्रूथ अबाउट द जालियांवाला बाग मैसेकर' के आधार पर बनी है। इस किताब के लेखक शंकरन नायर के परपोते रघु पलत और उनकी पत्नी पुष्पा पलत हैं। सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सी. शंकरन नायर का जिक्र किया।
आखिर ये सी. शंकरन नायर कौन थे? नायर का जलियांवाला बाग नरसंहार से क्या रिश्ता था? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनका जिक्र क्यों किया? शंकरन नायर का कांग्रेस में क्या कद था और उनके महात्मा गांधी के साथ कैसे रिश्ते थे? आइये जानते हैं...
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सी. शंकरन नायर के ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती देने के किस्से पर बनी है फिल्म केसरी चैप्टर-2।
- फोटो : Ministry of Culture/Dharma Production
फिल्म केसरी चैप्टर-2 18 अप्रैल को सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है। इस फिल्म में अभिनेता अक्षय कुमार ने सी. शंकरन नायर का किरदार निभाया है। यह फिल्म 2019 में आई किताब- 'द केस दैट शूक द एंपायर: वन मैन्स फाइट फॉर ट्रूथ अबाउट द जालियांवाला बाग मैसेकर' के आधार पर बनी है। इस किताब के लेखक शंकरन नायर के परपोते रघु पलत और उनकी पत्नी पुष्पा पलत हैं। सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सी. शंकरन नायर का जिक्र किया।
आखिर ये सी. शंकरन नायर कौन थे? नायर का जलियांवाला बाग नरसंहार से क्या रिश्ता था? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनका जिक्र क्यों किया? शंकरन नायर का कांग्रेस में क्या कद था और उनके महात्मा गांधी के साथ कैसे रिश्ते थे? आइये जानते हैं...
पीएम मोदी ने कांग्रेस को घेरते हुए कहा, "कांग्रेस पार्टी ने एक राष्ट्रवादी को अब सिर्फ इसलिए किनारे कर दिया, क्योंकि वह उनके नैरेटिव में फिट नहीं होते। प्रधानमंत्री ने कहा कि हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और पंजाब के हर बच्चे को शंकरन नायर के बारे में पता होना चाहिए।"
चेत्तूर शंकरन नायर का जन्म केरल के एक जमींदार परिवार में हुआ था। उनके पिता मम्माइल रामुन्नी पणिकर ब्रिटिश सरकार में तहसीलदार के तौर पर काम करते थे। शंकरन नायर को उनका पारिवारिक नाम चेत्तूर मां पार्वती अम्मा चेत्तूर के खानदानी नाम से मिला था। शंकरन नायर ने आर्ट्स की डिग्री हासिल करने के बाद मद्रास लॉ कॉलेज से कानून की डिग्री ली। अपनी जबरदस्त तार्किक क्षमता और वाकपटुता के चलते वह आगामी वर्षों में एक जबरदस्त वकील, राज्य के एडवोकेट जनरल, राजनेता और बाद में जज बने।
बताया जाता है कि नायर को कानून की डिग्री मिलने के बाद उन्हें सर होराशियो शेफर्ड ने अपने चैंबर में रखा। सर शेफर्ड, जो कि बाद में मद्रास हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस भी बने, को शंकरन नायर की प्रतिभा को निखारने के लिए जाना जाता है। हालांकि, नायर का एक कौशल उनकी कभी हार न मानने वाला और किसी के सामने न झुकने वाला भाव भी था।
1880 में उन्हें मद्रास हाईकोर्ट से शुरू हुए करियर से लेकर 1908 तक सरकार के एडवोकेट जनरल (एजी) बनने के दौर तक कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। खुद ब्रिटिश शासन से उन्हें कई चुनौतियां मिलीं, लेकिन उनका अपनी मान्यताओं के लिए प्रतिबद्धता का लोहा ब्रिटिश शासन ने भी माना और 1912 में नायर को नाइटहुड की उपाधि से सम्मानित किया। इसके बाद वे सर सी. शंकरन नायर नाम से जाने गए। इससे पहले 1908 में उन्हें उन्हें मद्रास हाईकोर्ट में स्थायी जज के तौर पर नियुक्ति मिली।
राजनीति में भी रहे सक्रिय, कांग्रेस से रहा लंबा जुड़ाव
नायर कानून के क्षेत्र में बड़ा नाम होने के साथ ही राजनीति में भी बराबर सक्रिय रहे। उन्होंने भारत की आजादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई और कांग्रेस के साथ जुड़े रहे। 1897 में वे अमरावती में पार्टी के अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सबसे युवा अध्यक्ष भी बने। इस बैठक में उन्होंने भारत के स्वशासन की मांग को आगे रखा। 1900 में नायर मद्रास विधान परिषद के भी सदस्य बने।
1908 से 1921 के बीच ब्रिटिश शासन में अलग-अलग जिम्मेदारियां मिलने की वजह से वे राजनीति से कुछ हद तक दूर रहे। अंग्रेजों के बीच नायर की बुद्धिमता की चर्चाएं इस कदर थीं कि एक समय एडविन मोंटैग, जो कि ब्रिटिश सरकार में भारतीय मामलों के मंत्री थे, ने कह दिया था कि नायर एक 'असंभव व्यक्ति' हैं, जो कि अपनी बात रखने के लिए तेज चिल्लाते हैं और कुतर्क करने वालों की सुनते भी नहीं हैं। इतना ही नहीं शंकरन नायर को एक समय ब्रिटेन की महारानी के प्रतिनिधि यानी वायसरॉय के परिषद में भी जगह मिली थी।
जालियांवाला बाग नरसंहार ने कैसे भड़काई नायर में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ आग?
13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के मौके पर अमृतसर में स्थित जालियांवाला बाग में हजारों की संख्या में लोग रॉलेट एक्ट के विरोध में जुटे थे। इसी दिन ब्रिटिश सेना में अफसर ब्रिगेडियर जनरल ई. एच. डायर ने जालियांवाला बाग को घेरकर खड़े जवानों को निहत्थे लोगों पर गोली चलाने का आदेश दे दिया। बताया जाता है कि घटना में हजारों लोगों की जान गई थी, जिनमें कई महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे। वहीं, हजारों लोग इस कदम जख्मी हुए कि उनकी पूरी जिंदगी बर्बाद हो गई।
गवर्नर जनरल ओड्वॉयर ने कई मौकों पर जालियांवाला बाग नरसंहार को अंजाम देने वाले जनरल डायर का बचाव किया था। हालांकि, इस हत्याकांड के बाद ब्रिटिश शासन ने खुद ओड्वॉयर को भी जिम्मेदार माना था और उसे पंजाब से हटाकर इंग्लैंड वापस बुला लिया था।
शंकरन नायर के खिलाफ चले इस मामले में क्या हुआ था?
लंदन में चले इस मामले में 12 सदस्यीय ज्यूरी का गठन हुआ, जिसमें सभी अंग्रेजों को जगह दी गई। मामले की सुनवाई जस्टिस हेनरी मैककार्डी कर रहे थे, जिन पर इस मामले में ओड्वॉयर के लिए पक्षपाती रवैया अपनाने के भी आरोप लगे।
इस मामले की सुनवाई करीब साढ़े पांच हफ्ते तक चली। यह उस दौर का सबसे लंबा सिविल केस था। ज्यूरी ने इस केस में 11-1 के अंतर से शंकरन नायर के खिलाफ फैसला सुनाया।
शंकरन नायर को इस केस में वाद दायर करने वाले ओड्वॉयर को 500 पाउंड का जुर्माना चुकाने के निर्देश दिए गए। ओड्वॉयर ने कहा कि अगर नायर माफी मांग लें तो वह पेनल्टी नहीं लेंगे। हालांकि, नायर ने इससे इनकार कर दिया और पूरा जुर्माना भरा।
कहा जाता है कि जब भारत की आजादी का अभियान जोर पकड़ रहा था, तब इस कोर्ट केस ने ब्रिटिश शासन के अपनों को बचाने और भारतीयों के प्रति किए जा रहे भेदभाव को खोलकर रख दिया।
सी. शंकरन नायर इस घटना के बाद भी राजनीति और कानूनी तौर पर ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष करते रहे। 1934 में उनका निधन हो गया। हालांकि, जनरल ओड्वॉयर की कहानी यहां से खत्म नहीं होती। 1940 में ब्रिटेन के लंदन में स्थित कैक्सटन हॉल में भारतीय क्रांतिकारी उधम सिंह ने उसकी गोली मारकर हत्या कर दी। जालियांवाला बाग नरसंहार का बदला लेने से जुड़ी इस कहानी को शूजीत सरकार की फिल्म- 'सरदार उधम' में दर्शाया गया है।