केरल उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गई। याचिका में दावा किया कि संसद के पास अंग्रेजी भाषा के अलावा किसी अन्य भाषा में कानूनों का नाम रखने का अधिकार नहीं है।
अदालत में एक वकील जीवेश ने एक याचिका (पीआईएल) दायर की। जिसमें केंद्र सरकार को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023, भारतीय न्याय संहिता 2023 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 को अंग्रेजी शीर्षक देने के निर्देश देने की मांग की गई है। जो कि अब क्रमश: आपराधिक प्रक्रिया संहिता, भारतीय दंड संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम हो गया है।
उनकी याचिका दावा किया गया कि उन विधानों को हिंदी और संस्कृत शीर्षक देना संविधान के दायरे से बाहर है। उन्होंने दलील दी कि केंद्र ने उन महत्वपूर्ण कानूनों को हिंदी और संस्कृत शीर्षक दिए हैं, लेकिन दक्षिण भारत में अधिकांश लोग इन दो भाषाओं से परिचित नहीं है।
उन्होंने कहा "इन कानूनों के लिए हिंदी और संस्कृत में नामकरण गैर-हिंदी और गैर-संस्कृत बोलने वालों के कानूनी समुदाय के लिए भ्रम, अस्पष्टता और कठिनाई पैदा करेंगे, खासकर देश के दक्षिणी हिस्से से संबंधित लोगों के लिए। उन्होंने यह भी कहा कि "उपरोक्त भाषाओं में दिए गए नामों का उच्चारण गैर-हिंदी और गैर-संस्कृत बोलने वालों के लिए कठिन है। इसलिए यह संविधान के अनुच्छेद 19 (भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) के तहत मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।" .
उन्होंने दावा किया कि तीन अधिनियमों का नाम हिंदी और संस्कृत में रखना संविधान के अनुच्छेद 348 (सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों और अधिनियमों, विधेयकों आदि के लिए इस्तेमाल की जाने वाली भाषा) के तहत जनादेश के खिलाफ है।
वकील जीवेश ने दलील पेश करते हुए कहा कि अनुच्छेद 348(1)(बी) में कहा गया है कि विधायी निकायों में पेश किए गए सभी विधेयक और उनके द्वारा पारित अधिनियम अंग्रेजी भाषा में होंगे।