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केरल हाईकोर्ट का बड़ा कदम: कोर्ट परिसर में यौन उत्पीड़न रोकने के लिए नए नियम लागू, सख्त निगरानी का प्रावधान

Thu, 19 Mar 2026 12:59 AM IST
Shivam Garg न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोच्चि

सार

केरल हाईकोर्ट ने कोर्ट परिसर में यौन उत्पीड़न रोकने के लिए नए नियम लागू किए हैं। जीएसआईसीसी समिति गठित होगी और शिकायतों के निपटारे के लिए सख्त प्रावधान किए गए हैं।

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केरल हाईकोर्ट (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : ANI
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विस्तार
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महिला सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करने की दिशा में केरल हाईकोर्ट ने बड़ा कदम उठाया है। कोर्ट परिसर में यौन उत्पीड़न की घटनाओं को रोकने और शिकायतों के प्रभावी निपटारे के लिए नए नियम लागू किए गए हैं।

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23 मार्च से लागू होंगे नए नियम
इन नियमों को 'महिलाओं के प्रति लैंगिक संवेदनशीलता और यौन उत्पीड़न विनियम, 2026' के तहत अधिसूचित किया गया है, जो 23 मार्च से प्रभावी होंगे। यह अधिसूचना राज्य के राजपत्र में 17 मार्च को प्रकाशित की गई।

GSICC समिति का गठन
नए नियमों के तहत लिंग संवेदनशीलता और आंतरिक शिकायत समिति (जीएसआईसीसी) का गठन किया जाएगा, जिसमें 7 से 13 सदस्य होंगे। इसमें एक या दो न्यायाधीश शामिल होंगे, जिनमें से एक समिति का अध्यक्ष होगा। इसके अलावा, वरिष्ठ वकील, महिला वकील संगठनों के प्रतिनिधि और क्लर्क्स एसोसिएशन के सदस्य भी इसमें शामिल किए जाएंगे। मुख्य न्यायाधीश को भी महिला एवं बाल विकास विभाग या सामाजिक न्याय से जुड़े एनजीओ से विशेषज्ञों को नामित करने का अधिकार होगा।
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कार्यकाल और जिम्मेदारियां
जीएसआईसीसी के सदस्यों का कार्यकाल दो वर्ष का होगा और कोई भी सदस्य लगातार दो बार से अधिक नियुक्त नहीं किया जा सकेगा। समिति हर तीन महीने में कम से कम एक बैठक करेगी और जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त बैठक भी बुला सकती है। यह समिति न केवल शिकायतों की जांच करेगी, बल्कि जेंडर सेंसिटाइजेशन को बढ़ावा देने के लिए नीतियां बनाने और उन्हें लागू करने का काम भी करेगी।

यौन उत्पीड़न की विस्तृत परिभाषा
नियमों में यौन उत्पीड़न की स्पष्ट परिभाषा दी गई है। इसमें शारीरिक संपर्क, अश्लील टिप्पणी, यौन संबंधों की मांग, अश्लील सामग्री दिखाना या भेजना, पीछा करना (स्टॉकिंग) और निजी पलों में झांकना (वॉयूरिज्म) जैसे कृत्य शामिल हैं। इसके अलावा, पद का दुरुपयोग कर महिला को दबाव में लाना, करियर में लाभ या नुकसान का डर दिखाना, या कार्यस्थल का माहौल असुरक्षित बनाना भी यौन उत्पीड़न माना जाएगा।

POSH कानून को मिलेगी प्राथमिकता
इन नियमों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यौन उत्पीड़न अधिनियम 2013 के प्रावधान सर्वोपरि होंगे। जिन मामलों पर यह कानून लागू होगा, उनमें जीएसआईसीसी हस्तक्षेप नहीं करेगा। जांच रिपोर्ट मिलने के बाद मुख्य न्यायाधीश दोनों पक्षों को सुनवाई का मौका देंगे और उसके आधार पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा।

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बिना आधार किसी महिला के चरित्र पर आरोप लगाना सामाजिक हिंसा का रूप- केरल हाईकोर्ट

एक अन्य मामले में केरल हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी महिला के चरित्र पर बिना किसी ठोस आधार के आरोप लगाना सामाजिक हिंसा का एक घातक रूप है। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि जब समाज किसी महिला की उपलब्धियों से अधिक उसकी छवि पर ध्यान देता है, तो वह अपनी बौद्धिक गरीबी को उजागर करता है। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति सी.एस. डायस ने उस मामले में की, जिसमें मलयालम फिल्म अभिनेत्री श्वेता मेनन के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया गया। उन पर आरोप था कि उन्होंने अपनी कुछ पुरानी फिल्मों और विज्ञापनों के कथित अश्लील दृश्य प्रसारित किए।

अदालत ने माना कि अभिनेत्री का यह दावा सही प्रतीत होता है कि शिकायत केवल उन्हें एसोसिएशन ऑफ मलयालम मूवी आर्टिस्ट्स (AMMA) के अध्यक्ष पद के चुनाव में भाग लेने से रोकने के उद्देश्य से दर्ज कराई गई थी, वह भी नामांकन वापसी की अंतिम तिथि से ठीक पहले। अदालत ने कहा कि शिकायत दर्ज करने का समय ही उसके दुर्भावनापूर्ण और परेशान करने वाले इरादे को दर्शाता है। कोर्ट ने रिकॉर्ड, शिकायत, एफआईआर और संबंधित कानूनों की समीक्षा के बाद पाया कि अभिनेत्री के खिलाफ लगाए गए आरोप साबित नहीं होते हैं और ये केवल उनकी छवि खराब करने के इरादे से लगाए गए थे।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि किसी महिला के चरित्र पर बिना ठोस आधार के आरोप लगाना बेहद खतरनाक सामाजिक हिंसा है, क्योंकि ऐसे आरोप लगाना आसान होता है, लेकिन उससे जुड़ा कलंक लंबे समय तक बना रहता है। अदालत ने यह भी कहा कि जब कोई महिला सार्वजनिक जीवन में नाम, पहचान और सफलता हासिल करती है, तो उसे तर्क और योग्यता के आधार पर हराना कठिन हो जाता है और तब सामाजिक बदनामी एक हथियार के रूप में इस्तेमाल की जाती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि महिला सशक्तिकरण का मतलब उन्हें निर्दोष या संत मानना नहीं है, बल्कि उनकी पहचान, आकांक्षाओं और उपलब्धियों को सम्मान और निष्पक्षता के साथ स्वीकार करना है। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि जो समाज ईर्ष्या या द्वेष के कारण किसी महिला की बदनामी को सहन करता है, वह अन्याय का प्रतीक बन जाता है।

गौरतलब है कि पिछले वर्ष अगस्त में हाईकोर्ट ने इस मामले में एफआईआर पर रोक लगा दी थी। अभिनेत्री के खिलाफ आईटी एक्ट की धारा 67 और अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया था। हालांकि अदालत ने पाया कि शिकायत में लगाए गए आरोप बिना किसी साक्ष्य के थे और इतने गंभीर आरोपों के लिए पर्याप्त नहीं थे।

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