केरल हाईकोर्ट ने बुधवार को राज्य विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए केरल के राज्यपाल के लिए समय सीमा निर्धारित करने की मांग वाली जनहित याचिका खारिज कर दी। मुख्य न्यायाधीश एस. मणिकुमार और न्यायमूर्ति शाजी पी चाली की खंडपीठ ने कहा कि न्यायालय विधेयकों पर कार्रवाई करने के लिए राज्यपाल को कोई समय सीमा नहीं दे सकता। यह याचिका वकील अलुवा निवासी पीवी जीवेश ने दायर की थी।
अदालत में दायर याचिका में कहा गया था कि कई विधेयक राज्यपाल की स्वीकृति के लिए लंबित पड़े हैं जिनको काफी समय हो गया है। याचिकाकर्ता पीवी जीवेशका कहना था कि राज्यपाल ने न तो अपनी स्वीकृति दी और न ही पुर्नविचार के लिए वापस भेजा। याचिकाकर्ता का कहना था कि राज्यपाल ने इन विधेयकों को राष्ट्रपति के विचार के लिए भेजने के विकल्प का भी प्रयोग नहीं किया।
जनहित याचिका को खारिज करते हुए, अदालत ने कहा कि राज्यपाल द्वारा विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए समय सीमा तय करना अदालत का कर्तव्य नहीं है और ऐसा करना विधायिका का काम है। वहीं याचिका में कहा गया है कि विधानसभा से पारित विधेयकों पर राज्यपाल की कार्रवाई असंवैधानिक, अलोकतांत्रिक, संविधान के खिलाफ है और यह कार्रवाई राजनीतिक एजेंडे के तहत की जाती हैं।
याचिका में कहा गया है कि कैबिनेट द्वारा पारित विधेयक पर हस्ताक्षर करना राज्यपाल का संवैधानिक दायित्व है। यदि विधेयक को मंजूरी नहीं मिलती है, तो इसे वापस विधानसभा या राष्ट्रपति के पास भेजा जाना चाहिए। आगे कहा गया है कि विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए एक समय सीमा निर्धारित की जानी चाहिए और इसे लोकतांत्रिक और संवैधानिक सिद्धांतों के खिलाफ घोषित किया जाना चाहिए।
याचिका में कहा गया था कि अनेक विधेयक कुछ समय से राज्यपाल की स्वीकृति के लिए लंबित पड़े हैं। याचिकाकर्ता का कहना था कि राज्यपाल ने न तो अपनी स्वीकृति दी और न ही पुर्नविचार के लिए वापस भेजा। याचिकाकर्ता का कहना था कि राज्यपाल ने इन विधेयकों को राष्ट्रपति के विचार के लिए भेजने के विकल्प का भी प्रयोग नहीं किया।