केरल हाईकोर्ट ने सोमवार को दुर्घटना के बाद मुआवाजा देने के मामले में बीमा कंपनी को एक महत्वपूर्ण आदेश दिया। केरल हाईकोर्ट ने कहा कि एक बीमा कंपनी दुर्घटना के शिकार या तीसरे पक्ष को प्रारंभिक रूप से मुआवजा देने के लिए उत्तरदायी है, भले ही बीमा पॉलिसी के अनुसार चालक के नशे में होने पर मुआवजे के भुगतान को लागू करती हो या नहीं। हाईकोर्ट ने यह फैसला मुहम्मद रशीद बनाम गिरिवासन ईके और अन्य के मामले में सुनवाई के दौरान दिया।
न्यायमूर्ति सोफी थॉमस ने कहा कि भले ही बीमा पॉलिसी में इस बात का जिक्र हो कि शराब पीकर गाड़ी चलाने की वजह से दुर्घटना होने पर मुआवजा नहीं दिया जाएगा। फिर भी बीमा कंपनी को शुरुआत में तीसरे पक्ष को भुगतान करना होगा। इसके बाद बीमा कंपनी चालक या गाड़ी के मालिक, जो भी अंततः दुर्घटना के उत्तरदायी हो, से दी गई राशि को प्राप्त कर सकता है।
अदालत ने कहा कि भले ही बीमा पॉलिसी के प्रमाणपत्र में यह शर्त हो कि नशे की हालत में वाहन चलाना पॉलिसी के नियमों और शर्तों का उल्लंघन है, फिर भी बीमा कंपनी मुआवजे के भुगतान के लिए उत्तरदायी है। निस्संदेह जब ड्राइवर नशे की हालत में होता है, तो निश्चित रूप से उसकी चेतना और इंद्रिया क्षीण हो जाती हैं, जिससे वह वाहन चलाने के लिए अयोग्य हो जाता है। लेकिन पॉलिसी के तहत देयता प्रकृति में वैधानिक है और इसलिए कंपनी पीड़ित को मुआवजे के भुगतान से मुक्त होने के लिए उत्तरदायी नहीं है। चूंकि उल्लंघन करने वाले वाहन का तीसरे पक्ष के लिए बीमा कंपनी के साथ वैध रूप से बीमा किया गया था और अपीलकर्ता या दावेदार एक तीसरा पक्ष है इसलिए कंपनी शुरुआत में उसे मुआवजा देने के लिए उत्तरदायी है। लेकिन बीमा कंपनी दुर्घटना के लिए जिम्मेदार एक और दो (ड्राइवर और मालिक) से इसे वसूल करने के लिए पात्र है।
न्यायालय एक अपील पर विचार कर रहा था जिसमें मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (एमएसीटी) द्वारा दिए गए मुआवजे को इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि यह अपर्याप्त था। मामले के तथ्य यह है कि 2013 में जब अपीलकर्ता एक ऑटोरिक्शा में यात्रा कर रहा था तब वह दुर्घटना का शिकार हो गया था। उस समय पहले प्रतिवादी द्वारा चलाए जा रहे कार ने ऑटोरिक्शा को टक्कर मार दी थी। अपीलकर्त्ता को सड़क पर फेंक दिया गया था और उसे गंभीर चोटें आई थीं। उसे एक अस्पताल में भर्ती कराया गया और सात दिनों तक उसका इलाज चला और उसने दावा किया कि डिस्चार्ज होने के बाद भी उसे छह महीने तक आराम करना पड़ा।
अपीलकर्त्ता पेशे से ड्राइवर है और उसकी मासिक आय 12,000 रुपये थी। उसने चार लाख रुपये के मुआवजे का दावा करते हुए एमएसीटी से संपर्क किया था, लेकिन न्यायाधिकरण ने केवल दो लाख 40 हजार रुपये देने का आदेश दिया। जिसके बाद उसने वर्तमान अपील के साथ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। न्यायालय ने कहा कि कार के चालक के खिलाफ दायर मामूली मामले की चार्जशीट से पता चलता है कि वह नशे की हालत में कार चला रहा था और यह तथ्य ड्राइवर या मालिक द्वारा विवादित नहीं था। बीमा कंपनी ने कहा कि वह बीमाधारक को क्षतिपूर्ति देने के लिए उत्तरदायी नहीं है क्योंकि चालक शराब के नशे में गाड़ी चला रहा था।
अदालत ने बीमा कंपनी को अपीलकर्ता के बैंक खाते में सात फीसदी प्रति वर्ष की दर से ब्याज के साथ मूल मुआवजे और कमाई की हानि, दर्द और पीड़ा सहित अन्य खर्च के नुकसान के लिए 39,000 रुपये की अतिरिक्त राशि जमा करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने बीमा कंपनी को यह जमा राशि कार के चालक और मालिक से वसूलने का भी निर्देश दिया।