लेफ्ट पार्टियों खासकर सीपीएम का गढ़ माने जाने वाले केरल में बीजेपी अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है। लेकिन उसके लिए यहां की राह उतनी आसान नहीं है। हिंदू वोटों के सहारे देश भर में तेजी से आगे बढ़ने वाली बीजेपी दक्षिण भारत में लेफ्ट के इस मजबूत किले में सेंध लगाने के लिए हालांकि कोशिश जरूर कर रही। उधर सीपीआईएम की अगुवाई वाली लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) और कांग्रेस के नेतृत्व वाली मुख्य विपक्षी पार्टी यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) भी किसी भी तरह की ढिलाई बरतने की मूड में नहीं हैं।
केरल के 140 विधानसभा सीटों की अगर बात की जाए तो यहां 40 साल से केरल की कुर्सी एलडीएफ और यूडीएफ फ्रंटों के पास ही रही है। राज्य में यही दोनों बड़े राजनीतिक धड़े हैं। 1982 के बाद से राज्य की राजनीति इन्हीं दोनों फ्रंट के इर्द-गिर्द घूमती रहती है। लेकिन मौजूदा दौर में यहां एलडीएफ का दबदबा है और उसी की सरकार भी है।
पिछले चुनाव में एलडीएफ का दबदबा
बात करें आंकड़ों की तो पिछले विधानसभा चुनाव में एलडीएफ को 140 में से 92 सीटों पर जीत मिली थी। वहीं यूडीएफ के खाते में 43 सीट और एनडीए का एक सीट के साथ खाता खुला था, जिसमें बीजेपी का उम्मीदवार जीता था। बात करें 2016 विधानसभा चुनाव में अलग-अलग राजनीतिक दलों के प्रदर्शन पर तो सीपीआईएम (58), कांग्रेस (22), सीपीआई (19), मुस्लिम लीग (18), केरल कांग्रेस (6) और भाजपा ने एक सीट जीती थी।
यूडीएफ गठबंधन में फूट
पांच साल बाद यहां एक बार फिर से चुनाव का नगाड़ा बज गया है और छह अप्रैल को वोटिंग की तारीख तय हो गई है। लेकिन फिलहाल परिस्थितियां बदली हुई हैं और चुनावों में समीकरण भी बदल सकते हैं। इस बार यूडीएफ गठबंधन में फूट पड़ गई है और भाजपा गठबंधन वाली एनडीए इसका फायदा उठाने की कोशिश में है।
जातीय समीकरण हावी
बात करें राज्य 2.67 करोड़ की आबादी वाले इस खूबसूरत राज्य की तो यहां ईसाईयों की आबादी 18.38 प्रतिशत और मुस्लिम की आबादी 26.56 प्रतिशत है। इन दो अल्पसंख्यकों का रुझान ही केरल की सत्ता तय करता है। राज्य की सियासत में चर्च और ट्रेड यूनियंस का भी खासा दबदबा है। यही कारण है कि बीजेपी यहां हिंदू वोटरों के साथ-साथ ईसाई वोटरों को साधने की कोशिश में भी है, ऐसे में आने वाले समय में वोटिंग समीकरण में कुछ बदलाव हो तो कोई हैरानी नहीं होगी।