केजरीवाल ने मांगा मौका
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान बुधवार को हरियाणा के हिसार में पहुंचे थे। उन्होंने 'मेक इंडिया नंबर वन' अभियान की शुरुआत की। केजरीवाल ने लोगों को बताया कि भारत अभी तक दुनिया का नंबर-वन देश क्यों नहीं बन सका। दिल्ली की तर्ज पर उन्होंने प्रदेश में मोहल्ला क्लिनिक, मुफ्त बिजली पानी, अच्छी शिक्षा व स्वास्थ्य के मुद्दे पर लोगों का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया। केजरीवाल ने कहा, एक मौका आम आदमी पार्टी को दीजिये। 'हरियाणा मेरी जन्मभूमि' है। हरियाणा की जनता ने मौका दिया, तो वे प्रदेश की तस्वीर और तकदीर बदलने का काम करेंगे। सीएम भगवंत मान ने कहा, हरियाणा के लोग बदलाव के लिए तैयार हैं।
प्रदेश की राजनीति का गहराई से विश्लेषण करने वाले वरिष्ठ पत्रकार रविंद्र कुमार कहते हैं, अभी हरियाणा में राजनीतिक गतिविधियां शुरू हुई हैं। यहां के विधानसभा चुनाव की एक खास बात है। उसका सीधा संबंध केंद्र में बनने वाली सरकार से होता है। इसे यूं भी समझा जा सकता है कि जिस पार्टी की केंद्र में सरकार होती है, ज्यादा नहीं तो उसका असर, कम से कम पचास फीसदी सीटों पर तो पड़ ही जाता है। वजह, हरियाणा में विधानसभा चुनाव, लोकसभा चुनाव के तकरीबन चार-पांच माह बाद होते हैं। ऐसे में उस दल को कुछ बढ़त मिल जाती है, जिस दल की केंद्र में सरकार बनती है। केजरीवाल की पार्टी, यहां कैसा प्रदर्शन करेगी, इस बाबत अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी। पंजाब में भले ही आप की सरकार है, लेकिन दोनों राज्यों की चुनावी तस्वीर अलग है।
कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान पड़ सकती है भारी
हरियाणा में अगर पंजाब जैसा कुछ है तो वह कांग्रेस पार्टी में चल रही अंदरूनी खींचतान है। पंजाब में इसी खींचतान का खामियाजा, कांग्रेस पार्टी भुगत चुकी है। हरियाणा में पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा का पार्टी पर एकछत्र राज है। भले ही रणदीप सुरजेवाला, कुमारी शैलजा या कोई दूसरा नेता कांग्रेस हाईकमान के करीब चला जाए, लेकिन हुड्डा की मर्जी के बिना पार्टी में कोई फेरबदल नहीं होता। हुड्डा के साथ अनबन के चलते पार्टी के पूर्व अध्यक्ष अशोक तंवर को बाहर जाना पड़ा। उसके बाद कुमारी शैलजा को पार्टी की कमान सौंपी गई। तब भी पार्टी की गुटबाजी खत्म नहीं हुई। इसके बाद हुड्डा खेमे के ही उदयभान को प्रदेशाध्यक्ष बनाया गया।
दरअसल हुड्डा, प्रदेश के दस साल तक सीएम रहे हैं। उन्होंने इनेलो के परंपरागत वोट बैंक रहे 'जाट समुदाय' में बड़ी सेंध लगाई। जाट वोटरों का एक बड़ा हिस्सा, हुड्डा के साथ आ गया। मौजूदा समय में भी कांग्रेस पार्टी के अधिकांश विधायक, हुड्डा के प्रभाव में हैं। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, पहले दो बार जब डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने, तो प्रदेश में हुड्डा ने मुख्यमंत्री की कमान संभाली। 2014 और 2019 में जब मोदी, देश के पीएम बने, तो खट्टर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने हैं। केजरीवाल की बढ़ती लोकप्रियता से खट्टर इसलिए परेशान नहीं हो रहे, क्योंकि वे जानते हैं कि आम आदमी पार्टी जो भी वोट प्रतिशत हासिल करेगी, उससे कांग्रेस को ही नुकसान होगा। प्रदेश में भाजपा का अपना कैडर वोट बैंक है। अगर वे उसे संभाल कर रखने में कामयाब होते हैं तो विधानसभा चुनाव में उन्हें कोई नुकसान नहीं होगा। वजह, केजरीवाल द्वारा कांग्रेस पार्टी के वोट बैंक में सेंध लगाई जाएगी। दूसरी तरफ इनेलो का ग्राफ बढ़ता है तो भी उसका असर कांग्रेस पर ही पड़ेगा। जजपा या इनेलो, चुनाव में अच्छा करते हैं तो ये एक दूसरे का ही वोट काटेंगे। इसी के चलते, मुख्यमंत्री खट्टर आश्वास्त हैं।