इस पूरे मशीन का आधार है लेजर तकनीक। वैज्ञानिकों ने मेक इन इंडिया को ध्यान में रखते हुए लेजर की जगह पर
एलईडी बल्ब का इस्तेमाल किया है। एक बार सलाइवा लेने या फूंक मारने के बाद तत्व एक पाइप के जरिए मशीन में लगे एलईडी के सामने पहुंचते हैं।
यहां करीब एक मिनट तक जांच के बाद सॉफ्टवेयर पर रिजल्ट एक ग्राफ के जरिए दिखाई देने लगता है। ये सॉफ्टवेयर भी विशेष तौर पर मशीन के लिए बनाया गया है। दावा है कि इस मशीन को बनाने में महज 2 लाख रुपये का खर्चा आया है और आकार में छोटी होने से इसे कहीं भी रखा जा सकता है।
तीन साल में पूरा हुआ शोध
वैज्ञानिकों ने बताया कि तीन वर्ष पहले शोध को शुरू किया था। उस वक्त देश में कैंसर जैसी बीमारियों की स्थिति ज्यादा और सुविधाएं कम थीं। वर्ष 2014 से 2017 के बीच वैज्ञानिकों ने कई देशों और विज्ञान के मॉडल को फॉलो करते हुए फोटोन मशीन को नया अवतरण दिया है।
कर्नाटक सरकार देगी तोहफा
मशीन का ट्रॉयल किया जा चुका है। हालांकि कुछ बदलाव होने के बाद इसे मान्यता के लिए राज्य सरकार के समक्ष पेश किया जाएगा। बताया जा रहा है कि कर्नाटक सरकार इस मशीन को तोहफे के रूप में प्रधानमंत्री को देने वाली है। इसलिए सरकार का इस पर फोकस ज्यादा है। अंतिम मंजूरी के लिए जल्द मशीन को दिल्ली भेजा जाएगा।