तमाम उतार-चढ़ावों और राजनीतिक उठापटक के बाद आखिर भाजपा कर्नाटक में सरकार नहीं बचा पाई। पूरे देश ने इस राजनीतिक ड्रामेबाजी को बड़े ही अफसोस और क्षोभ के साथ देखा। कर्नाटक विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी के पास पर्याप्त संख्या बल नहीं था, यह तो सभी जानते हैं। लेकिन पार्टी ने तब भी हार नहीं मानी और राज्यपाल के सामने सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया।
हालांकि कांग्रेस ने मतगणना पूरी होने के पहले ही अपनी रणनीति बना ली थी और जनता दल सेक्युलर के एचडी कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री पद की पेशकश हो गई थी। यह रणनीति सिर्फ भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए बनाई गई।
कांग्रेस-जदएस गठबंधन ने दावा किया कि उनके पास बहुमत का आंकड़ा है, बावजूद इसके राज्यपाल वजुभाई वाला ने भाजपा के येदियुरप्पा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया। उस पर दरियादिली यह कि बहुमत साबित करने के लिए भाजपा ने सात दिन मांगे तो राज्यपाल ने उन्हें 15 दिन दे दिये। हालांकि मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और वहां से इस फैसले को बदल दिया गया। सर्वोच्च अदालत ने 15 दिन की अवधि को शनिवार शाम 4 बजे तक सीमित कर दिया था।
यहीं से शुरू हुई थी सरकार बनाने की रस्साकशी और शुरू हो गए थे खरीद-फरोख्त जैसे आरोप। कभी कांग्रेस के विधायक लापता हुए तो कभी जनता दल-एस के। दोपहर साढ़े तीन बजे तक यह खेल जारी रहा। लेकिन बहुमत साबित करने का समय पास आते-आते ऐसी खबरें आने लगीं कि मुख्यमंत्री येदियुरप्पा फ्लोर टेस्ट से पहले ही इस्तीफा दे देंगे। माना जा रहा है कि यह रणनीति पहले ही तय हो चुकी थी, कि अगर सरकार बनाने लायक संख्या बल जुटा तो अच्छा नहीं तो इस्तीफा देकर लाज बचाई जाएगी और खुद को तुच्छ राजनीति का शिकार साबित किया जाएगा।
सवाल ये है कि इस सब से आखिर भाजपा को क्या हासिल हुआ? दरअसल इसमें भाजपा की तो किरकिरी ही हुई है। पर हां येदियुरप्पा की जिद की जीत जरूर हुई है। मोदी-शाह ने तो सब उन पर छोड़ दिया था। येदियुरप्पा को ये भी लगता था की अगर वो सरकार नहीं भी बना पाए तो भी विधानसभा में यादगार भाषण देकर तगड़ी सहानुभूति हासिल कर लेंगे, शायद वाजपेयी जी की तरह।
उनका आज का भाषण अगर ध्यान से सुनें तो ये स्पष्ट भी हो जाता है। वो इस कोशिश में कितने कामयाब हुए हैं ये तो आने वाला वक्त बताएगा, पर हां, भाजपा को अब तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों और फिर 2019 के आम चुनाव के लिए तगड़ी तैयारी करनी होगी।