कर्नाटक हाईकोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में कहा कि पति-पत्नी का एक ही घर में अलग-अलग कमरों में रहना अपने आप में वैवाहिक क्रूरता नहीं है। जस्टिस डीके सिंह और जस्टिस एच शांति भूषण की पीठ ने यह टिप्पणी पारिवारिक कोर्ट के निर्णय के खिलाफ दायर पति की अपील को खारिज करते हुए की। पारिवारिक कोर्ट ने क्रूरता के आधार पर दंपती की शादी को रद्द कर दिया था और पति को 25,000 रुपये प्रति महीने स्थायी गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया था। इसे हाईकोर्ट ने बरकरार रखा है।
हाईकोर्ट ने कहा कि केवल अलग कमरों में रहना क्रूरता नहीं है, लेकिन जब इसके साथ-साथ लगातार झगड़े, मानसिक प्रताड़ना, बात-बात पर शक करना और आपसी विश्वास का टूटना जैसी कई बातें लंबे समय तक जुड़ती रहती हैं, तो उन सभी का मिलाजुला (संचयी) असर वैवाहिक क्रूरता को साबित कर देता है। इस मामले में दंपती की 11 नवंबर 2001 को शादी हुई थी और उनके दो बच्चे हैं।
बरी होने का अर्थ यह नहीं है कि शिकायत झूठी थी
मानसिक प्रताड़ना के संदर्भ में कोर्ट ने यह भी माना कि पति के खिलाफ दर्ज धारा 498-ए का आपराधिक मामला भले ही बरी होने पर समाप्त हो गया हो, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि शिकायत झूठी थी। पीठ ने कहा कि कोई भी जीवनसाथी उस आचरण को अनिश्चितकाल तक सहन नहीं कर सकता जो मानसिक पीड़ा दे और आपसी विश्वास को नष्ट कर दे।
अवैध गिरफ्तारी मामले में एसआई व अफसरों पर 3 लाख जुर्माना
कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक अन्य मामले में भी अहम निर्णय सुनाया। कोर्ट ने याचिकाकर्ता केएन मोहन रेड्डी (49) की अवैध और जल्दबाजी में की गई गिरफ्तारी पर कड़ी नाराजगी जताई और इसे पुलिस राज करार दिया। हाईकोर्ट ने बंगलूरू के व्हाइटफील्ड पुलिस स्टेशन से जुड़े जांच अधिकारी सब इंस्पेक्टर के खिलाफ विभागीय जांच का आदेश दिया। साथ ही, कोर्ट ने सब इंस्पेक्टर और उनके वरिष्ठ अधिकारियों को रेड्डी को व्यक्तिगत रूप से तीन लाख रुपये देने का निर्देश दिया।
रेड्डी को एक सिविल विवाद में 25 अगस्त को गैर-कानूनी तरीके से गिरफ्तार किया था। जस्टिस एम नागप्रसन्ना ने मौखिक टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता वसीयत पर हस्ताक्षर करने वाला व्यक्ति यानी गवाह है। आप उसे कैसे गिरफ्तार कर सकते हैं? यहां कानून का राज नहीं है। इस पुलिस राज को बंद करें, वरना हमें इसे सख्ती से रोकना होगा।
रेड्डी ने कोर्ट का दरवाजा तब खटखटाया जब पुलिस ने उन्हें 25 अगस्त को गिरफ्तार किया। उन्हें भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत नोटिस देकर 27 अगस्त को पुलिस के सामने पेश होने का निर्देश दिया गया था लेकिन उससे 48 घंटे पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया। यह मामला 10 अगस्त को उनके और एक अन्य व्यक्ति के खिलाफ दर्ज किया गया था।