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कर्नाटक में आरक्षण पर बड़ा फैसला: हाईकोर्ट ने कहा- एससी-एसटी का कोटा बढ़ाना असांविधानिक, चीफ जस्टिस क्या बोले?

Tue, 13 Oct 2026 01:48 AM IST
ज्योति भास्कर पीटीआई, बंगलूरू।

सार

कर्नाटक हाईकोर्ट ने 2022 के उस कानून को रद्द कर दिया है जिसमें अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति (एससी/एसटी) के लोगों को आरक्षण का लाभ मिलता था। कोर्ट ने साफ किया कि इस कानून में 50 फीसदी की सीमा का उल्लंघन किया गया जो असांविधानिक है। जिस कानूनी प्रावधान को निरस्त किया गया, उसे पूर्व मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के कार्यकाल में बनाया गया था।
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आरक्षण पर कर्नाटक हाईकोर्ट का बड़ा फैसला - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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कर्नाटक हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने 2022 के राज्य कानून के प्रावधानों को रद्द कर दिया है। इस कानून के तहत अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षण बढ़ाया गया था। हाई कोर्ट ने कहा कि यह बढ़ी हुई आरक्षण सीमा 50 फीसदी की उच्चतम सीमा का उल्लंघन करती है।

चीफ जस्टिस की पीठ का फैसला, टिप्पणी में क्या?

उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश विभु बखरू और न्यायाधीश के एस हेमलेखा की पीठ ने सोमवार को यह फैसला दिया। पीठ ने कहा कि कर्नाटक अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (शैक्षणिक संस्थानों में सीटों का आरक्षण और राज्य के तहत सेवाओं में नियुक्तियों या पदों का) अधिनियम, 2022 की धारा 3 संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन करती है। यह धारा आरक्षण को 50 फीसदी से ऊपर ले जाती है।

क्या 2022 में राज्य सरकार ने असांविधानिक फैसला लिया?

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 50 फीसदी से अधिक आरक्षण संविधान के इन अनुच्छेदों के खिलाफ है। हाई कोर्ट ने धारा 4 को भी असांविधानिक करार दिया। यह धारा राज्य सरकार की सेवाओं में एससी और एसटी के लिए बढ़े हुए आरक्षण का प्रावधान करती थी। कोर्ट ने कहा कि धारा 4 संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन करती है। इन अनुच्छेदों का उल्लंघन होने के कारण यह प्रावधान भी रद किया गया। 50 फीसदी की आरक्षण सीमा सुप्रीम कोर्ट ने 1992 के इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ मामले में तय की थी। बाद में कई फैसलों में इस सीमा को लगातार बरकरार रखा गया है।

क्या था यह कानून और क्यों दी गई चुनौती?

यह फैसला दो याचिकाओं के परिणामस्वरूप आया है। इन याचिकाओं में कानून की सांविधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी। कानून ने एससी, एसटी और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए कुल आरक्षण को 50 से बढ़ाकर 56 फीसदी कर दिया था। एक याचिका डॉ आंबेडकर अनुसूचित जाति फेडरेशन के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र कुमार मित्रा ने दायर की थी। दूसरी याचिका सागर एच आर, प्रज्वल कुमार डी और पुरुषोत्तम गौड़ा जी एम ने दायर की थी। ये सभी सिविल इंजीनियरिंग स्नातक हैं। उन्होंने बृहत बंगलूरू महानगर पालिके (बीबीएमपी) में सहायक इंजीनियर (सिविल) के पद पर नियुक्ति के लिए आवेदन किया था।

कब बना था यह कानून और इसकी पृष्ठभूमि क्या थी?

यह कानून भाजपा सरकार के कार्यकाल में मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई के नेतृत्व में पारित हुआ था। इसे राज्यपाल की मंजूरी 11 जनवरी, 2023 को मिली थी। कानून को 12 जनवरी, 2023 को कर्नाटक गजट में प्रकाशित किया गया था। यह कानून एससी और एसटी के प्रतिनिधित्व से संबंधित सिफारिशों के बाद आया था। इनमें न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) नागममोहन दास आयोग की रिपोर्ट शामिल थी। साथ ही, पूर्व हाई कोर्ट न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुभाष बी आदि की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिशें भी इसमें शामिल थीं।

सरकार की क्या प्रतिक्रिया है और आगे क्या होगा?

उपमुख्यमंत्री जी परमेश्वर ने हाई कोर्ट के इस फैसले को गंभीर बताया है। उन्होंने कहा कि इसके कर्नाटक में सामाजिक न्याय, शैक्षिक अवसरों और सार्वजनिक रोजगार पर दूरगामी प्रभाव होंगे। परमेश्वर ने कहा कि सरकार न्यायपालिका और सांविधानिक ढांचे का सम्मान करती है। उन्होंने पिछली भाजपा सरकार की राजनीतिक जिम्मेदारी पर सवाल उठाए। परमेश्वर ने भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की निष्क्रियता पर भी सवाल उठाए। उन्होंने प्रधानमंत्री और केंद्र से 50 फीसदी आरक्षण सीमा की व्यापक समीक्षा करने का आग्रह किया। परमेश्वर ने कर्नाटक के नौवीं अनुसूची में शामिल करने के अनुरोध पर तत्काल विचार करने की मांग की। कर्नाटक सरकार सुप्रीम कोर्ट में अपील सहित सभी कानूनी उपायों पर विचार करेगी। सरकार यह भी सुनिश्चित करेगी कि चल रही भर्ती और शैक्षिक अवसर कानून के अनुसार सुरक्षित रहें।

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